Thursday, 24 May 2018

स्वच्छ भारत अभियान 'किसके लिए और क्यों ?'

भारत सरकार का स्वच्छ भारत अभियान कई सालों से चलता आ रहा है। जिसके लिए करोड़ों रूपये और लाखों की संख्या में नगर पालिकाओं के कर्मचारियों को लगाया गया है। समय-समय पर केंदीय सरकार ने नागरिकों से भी अपील की कि साफ-साफाई करने के लिए वह भी योगदान दें, लेकिन एक सजग नागरिक को शायद पता है कि यह जिम्मेदारी किसकी है। ऐसे में भारत के बड़े- बड़े महानगरों के साथ  बड़े नगरों और औद्योगिक क्षेत्रों को सुंदर बनाने के प्रयास ने बहुत से शहरों को चमका दिया है। 
सरकारों ने शहरों के लिए और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए साफ-सफाई के लिए अगल-अगल व्यवस्था की है। अगल बजट दिया है, छोटी-छोटी सुविधाएं भी दी है ताकि वहां के वातावरण को साफ किया जा सके। ग्राम सभाओं को और नगर पालिकाओं को इसके लिए परिवहन और मैला ढौने के लिए सुविधाएं दी है, ताकि नागरिकों द्वारा की जाने वाली गंदगी को साफ किया जा सके।  फिर भी स्वच्छता हमारे आस-पास  दिखाई नहीं देती .....आखिर क्यों ?  क्या कारण है ? सफाई क्यों नहीं हो रही है ? इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? यह सब कौन कराएगां आदि सवाल हमारे पास हैं और उनके जवाब भी.....। शायद भारत को कोई भी ऐसा शहर नहीं होगा जहां गंदगी न हो, लेकिन कुछ शहरों में यह अझेल हो गई है। कई स्थानों पर तो गंदगी के ढ़ेर लगे। कई मीटर तक गंदी बदबू जाती है। वहा के आसपास की मिट्टी भी गंद मय हो गई है। लोग वहा से आना जाना भी पसंद नहीं करतें। यह सभी कमियां कुछ व्यवस्थाओं की हैं... बाकि कमी नागरिकों की। यदि तालमेल अच्छा हो तो सफाई का वातावरण बनाया जा सकताा है। जो कि स्वयं न तो सरकार के बस  में हो न ही नागरिकों के। सरकार के कुछ विभाग जो अच्छा कार्य करते है उनकी चमक दिख जाती है। मेरठ में पहल -एक प्रयास और मेरा शहर और मेरी पहल जैसे कुछ लोगों के समूह मेरठ व आसपास के जिलों में बहुत ही शानदार काम कर रहे हैं। गंदगी को कम करना कोई बड़ा काम नहीं है बस हमें एक दूसरे के साथ मिलकर उस पर रोज थोड़ा थोड़ा काम करना है और सभी को सफाई के प्रति सजग होकर हाथ बटाने की जरूरत है। जब हम गंदगी करने के लिए अपने हाथ बढ़ा सकतें है तो उसे दूर करने के लिए भी एक जुट हुआ जा सकता है।
यह समस्यां बाहर से नहीं आई है। यह सब हमारी ही देन है और हमें यदि इसे खुद भी दूर करना पड़े तो हमें ऐसा करने में कोई कोताही नहीं करनी चाहिए। हम दिन भर दूसरों की कमियां तू ढूंढ़ सकतें हैं लेकिन एक सबल विचार क्यों नहीं ला सकतें। जो लोग अच्छा काम करते है यदि उन्हें लोगों का सहयोग नहीं मिलता है तो उनकी आस भी टूट जाती है। हमें उनके उत्साह को बनाएं रखे रहना होगा। आगेआकर कार्यकरना होगा। व्यवस्थाएं हमेंशा समूह से नहीं बदली है, एक व्यक्ति के प्रयास से भी तस्वीर बदल सकती है। ऐसे में हमें खुद को कमजोर न समझे हुए अकेले भी कुछ योगदान देना पड़े तो हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए।

Monday, 6 November 2017

जल पर पूंजीवादी व्यवस्था हावी ना हो

कहा जाता है, जल है तो कल है” और जल ही जीवन है
हकीकत यह है कि हम उस देश के, उस मांटी के लाल है, जो भाइचारें, आपसी सोहार्द, अतिथि देवों भव: आदि न जाने कितनी कहावतों को न केवल हमने बनाया है बल्कि उन्हें जिया भी है। हमारे जीवन में दोस्ती, अपनापन, प्रेम, दूसरों के प्रति आदर, सम्मान, उनकी सहायता करने में हमारी तत्परता हमेशा से हमारे खून में रही है।  
आज पूंजीवाद का बोल-बाला है। लोगों की पूंजीवादी लालसा और सोच ने मानव चरित्र को दूषित किया है। हमें पता है कि हमारी जरूरत कितनी है। हम कितने में आराम से रह सकते है, लेकिन अब यह सोच पुरानी हो चुकी है। आज जमाना मोटी कमाई करने वालो का है। अब हम बच्चों के चरित्र, उनके व्यवहार, उनके आचरण की बात नहीं करते। आज हमारे बीच से बच्चों में चरित्र निर्णाण और उससे उनकी पहचान मिटने लगी है। ''आज पहचान वही बनाता है जो ज्यादा कमाता है।''
पूंजीवाद सोच ने हम सबको एक दूसरे से अगल करने का काम किया है। आलम यह है कि व्यक्ति दूसरे व्यक्ति में अपनी कमाई खोजता है। जैसे- मार्केटिंग में कहा जाता है कि आज सफल वही है जो गंजे को भी कंघा बेच दे। मैं अपने शहर के उन चौहारों को देख कुंठित हो उठता हूं जिन चौराहों पर कभी नल हुआ करते थें। वह आज सूख गए है...। कराण उनका पानी नहीं.., ना ही जलस्तर है। बल्कि कुछ तथाकथित लोगों की करामात है। उन स्थानों पर यदा-कदा किराना की दुकान खुल जाने से कुछ छोटी मानसिकता वाले लोगों ने उन नलों को बली चढ़ा दिया है ताकि वह किसी प्यासे राही की प्यास न बुझा सके। ऐसे में पानी की बोलत की बिक्री के लिए न जाने कितने भारतीयों ने अपनों के मुहं से पानी की बूंद-बूंद को छीना है। मैं देखता हूं कि बहुत से ढ़ाबों पर अब नल नहीं मिलता, यदि होता है तो उसे ऐसा स्थान दिया जाता है कि उससे पानी न पिया जा सके। यह सोच हम भारतीयों की कभी थी ही नहीं और कभी हो भी नहीं सकती है, लेकिन जो बर्वादी का वातावरण हमारे लिए तैयार किया जा रहा है उसे मन की आखों से देखने की जरूरत है।

जल हमारे जीवन का लिए नैसगिंक हिस्सा है। यदि पुराने दिनों को याद करें तो चुनावी मुद्दों में भी एक मुद्दा नलकूपों को लगवाने, पियाऊ खुलवाने का हुआ करता है। हमारी बसों के अड्डे, रुकने का स्थान जल की व्यस्था के अनुरूप ही हीता था। जिन्हें सराय के नाम से जाना जाता है। यदा-कदा कुछ स्थान ऐसे होते थे जहां लोगों का आवागमन ज्यादा हुआ करता था वहां पर भी पानी की व्यवस्था के लिए लोगों की मांग नल लगवाने की ही हुआ करती थी। चाहे उसका खर्च स्वयं उन्हें ही वहन क्यों न करना पड़े। कुल सामाजिक लोगों ने शीतल जल मुक्त में मिले उसके लिए पियाऊ की भी व्यवस्था देश के लगभग हर शहर में देखी जा सकता है। जो आपसी सहयोग की मिसाल है। लेकिन पूंजीवादी सोच ने अब एकल वादी सोच और स्व-उत्थान की विचारधारों को रौपने का काम किया है जहां हम हर चीज़ में अपना स्वार्थ खोजने लगते है। ऐसे में एकल-वादी सोच हमारे संस्कार, सभ्यता और परिवार की परिधि पर प्रहार की तरह है जो केवल विध्वंस करना जानती है।
ऐसे में हम प्रत्येक को पूंजीवादी व्यवस्था से उभरना होगा। जनकल्याण या जनहित में छोटा कार्य ही सही... जरूर करना चाहिए। अच्छे लोगों की अभी भी कमी नहीं है ... जब हम अच्छा सोचेगे तभी तो अच्छा कर पाएंगे। इसी लिए स्वयं से शुरुआत करे। मैं यकीन दिलाता हूं आप को अच्छा जरूर लगेगा। 



Friday, 11 August 2017

मुख्यधारा की ख़बरों का संकट

आजकल अखबारों और टीवी चैनलों को देखने पर मन-मस्तिष्क पर उदासीनता छाने लगी है। ख़बरों को देखे तो उनकी दुनिया और उसकी धूरी सिमटने लगी है। टेलीविजन पर करोड़ों की संख्या में से केवल सीमित लोगों, सीमित विषयों और सीमित क्षेत्रों की बात होने लगी है। राजनीति, क्राइम, पेज-3 और सरकारों के वादे ही आजकल टीवी स्क्रीन पर दौराए जा रहे है। चुनाव का कवरेज इतना बढ़ गया है, लगता है कि पूरा देश ही वोट डालने निकल पड़ा हो। ख़बरों का केंद्रिकरण होने लगा है। जन-सामान्य की स्थितियां टीवी चैनलों में गोण होने लगी है। राजनीति फण्डे इतने बढ़ गए है कि लगभग हर दिन कही ना कही धरना प्रदर्शन, विरोध, शक्ति प्रदर्शन, ज्ञापन सौपे जा रहे है। स्थिति ऐसी लगती है कि कहीं शांति का माहौल है ही नहीं, हर तरफ कलह, मायूसी, दर्द दिखाई दे रहा है।
समाचारों चैनलों में अच्छे लोगों की छवि दिखना बंद हो गई है। कई-कई घंटों के कार्यक्रम हेवानियत और औछी सोच वाले लोगों को दिखाया जा रहा है। यह शायद सामाज का वह पक्ष है जो दुषित होकर गल-सड़ रहा है और ऐसी सड़न को हर घर देखना नहीं चाहता। नाकारात्मक ख़बरों की बाढ़ सी आ गई है। हर रोज कई अख़बार के पन्ने और टीवी के कई घंटे इसी में व्यर्थ हो जाते है। अगले दिन फिर वहीं चीज़ दौहराई जाती है। हर रोज हेवानियत से भरी ख़बरें आती है छोटी-छोटी बच्चियों पर अत्याचार किया जा रहा है। लड़कियों के साथ ही एक आम आदमी खुद को बहुत ही असहाय और मजबूर महसूस कर रहा है। ऐसे में विचार किया जाना चाहिए कि हम कैसे समाज और कौन से दौर से गुजर रहे है जो इतना भी सभी को स्वतंत्रता नहीं दे पा रहा है कि सभी खुली हवा में सांस ले सके। अपनी इच्छानुसार काम कर सके। मुझे लगता है ऐसे में न्यायपालिका को तेजी से काम-काज करने की आवश्यकता है ताकि नाकारात्मकता पर विराम लगाया जा सके साथ ही मीडिया की भी अपनी अहम भूमिका है जिससे वह समाज में सुधार ला सकती है।

Tuesday, 2 May 2017

जो मजदूर है वह मजबूर है।

मजदूर शब्द से ही गुलामी की बू आती है। ऐसी बू जिसमें आदमी विशेष का कोई महत्व नहीं रहता है। चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़। आर्थिक मजबूरी ने लोगों को मजबूर बना दिया है। जब तक कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से अपने को स्वतंत्र नहीं कर लेता है। तब तक वह घुट-घुट कर अपनी जीविका चलाता है। निजी क्षेत्रों ने इसे और बढ़ाया है। ऐसे में व्यक्ति विशेष बिना किसी राय के जो आदेश मिलता है उसका पालन करता रहता है। रोजगार करते हुए कोई सुविधा मिल जाए तो ठीक है, कोई नई उम्मीद करना शायद उसको नसीब नहीं। कारण बाल-बच्चे और परिवार की जिम्मेदारी बहुत सी जनता को खुलकर सोचने के लिए शायद स्वतंत्रता नहीं देती। भारत जैसे देश में लोगों की मंशा कुछ ऐसी है कि यदि कोई व्यक्ति किसी मजबूर व्यक्ति को रोजगार देता है भी है तो ऐसे बहुत कम लोग होंगे जो उसकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहेगा।
बहुत से लोगों को वाह-वाही, जय-जयकार,जी-हजूरी ही पसंद है, यदि उनके सामने कर्मचारी नहीं झुका, दुआ सलाम नहीं की तो ऐसे में नौकरी की छुट्टी समझों। 

Thursday, 2 March 2017

सरकार की मंशा और जनता की आकांक्षाएं

सरकार की मंशा और जनता की आकांक्षाएं के बीच बहुत बड़ा अंतर प्रत्येक मेनिफेस्टों में साफ देखा जा सकता है। इसको आप हाल ही चुनावों में स्पष्ट रूप से देख सकते है। उम्मीदवारों के द्वारा दिए जाने वाले वादे और जनता की आवश्यकताओं को टटोलकर ही अलग-अलग जगहों के मेनिफेस्टो तैयार किए जाते है। यदि पुराने 15 या 20 साल पहले के मेनिफेस्टों को देखे तो यह सभी बाते दौबारा दौहराती हुई देखी जा सकती है। कहने का मतलब साफ है मंत्रियों या उम्मीदवारों को पता है कि कहां पर क्या काम किया जाना है फिर भी पांच साल कम क्यों पड़ जाते है ? फिर से उन्हीं बिंदुओं पर काम करने की जरूरत क्यों होती है ? यदि किसी कार्य के लिए पांच साल कम है तो ऐसी स्थिति में मेनिफेस्टों में वादे उसी रूप में किए जाने चाहिए। जनता को भी समझना होगा की वह किस मुद्दुओं पर काम करना चाहता है और काम करने की रणनीति क्यों होगी।
बहुत सी जनता केवल कुछ रोज मर्रा की चीजों के लिए अपने वोट को लुटा देते है, वास्तविकता अधिकांशत. यह जिम्मेदारी सरकार की स्वत. सभी नागरिकों को दी जाती है, लेकिन जानकारियों का अभाव के चलते जनता यह नहीं जान पाती है कि उसे कैसे, कब और किस तरह प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे में उम्मीदवार उन सभी चीजों का आश्वासन देकर वोट पाने की जुगत करने से कभी गुरेज नहीं करते। यदि व्यवहारिक रूप से इन सभी समस्याओं को देखे तो बहुत सारे नागरिकों के पास आज भी कोई-बड़े मुद्दे नहीं है। बहुत सारी जनता अपने आप में फसी हुई है। यदि किसी मुद्दे पर बात भी की जाती है तो उम्मीदवार वादा करते हुए साफ मना भी इस रूप में कर देता है कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है या फिर सरकार द्वारा उतना फंड नहीं मिला है जिससे काम किया जा सके। यह हम सभी वोटर को समझना होगा की उम्मीदवार जो भी वादे कर रहा है वह कितने धरातल से मेल खाते है। आपने मत के अधिकार का प्रयोग हम जाति, समाज और धर्म से ऊपर उठ एक ऐसे उम्मीदवार को चुने जो सही में जनता के मर्म को समझता है और जनहित में काम करना चाहता है।  

Thursday, 22 December 2016

मेरी प्रिय बेटी "नंदनी"

छोटी- छोटी आंखे है उसकी, छोटे-छोटे हाथ।
कभी भी मुस्कुरा देती है, बिना किसी के साथ।।

उसे न किसी की बात सुहाए, न भाए बरसात।
वह अपनी ही धुन में रहती , चाहे रात्रि हो, चाहे प्रभात।।

सारे दिन वह भर-भर सोए, रात्रि में हो जाए उठ तैयार।
रातों में वह सपने बुनती, सुबह थक, सो जाए भरमार।।

सभी को वह टक-टक देखे, पहचाने सबको बार-बार।
थोड़ी देर में सब भूल जाती, फिर से जांचे बारम्बार।।

मैं तरस्ता हूं, उसके एक दिदार को।
प्रेम उसे करता हूं... अथाह ! भरमार !!

© सुरेद्र कुमार अधाना
दिनांक : 22 फरवरी 2015 (कविता लिखने की तिथि)



मैेरे प्रथम जन्मदिवस पर 07 माह की नन्हीं परी, नींद में ही शुभकामनाएं देती हुई। 

नोट बंदी में... बंद हालात, आम मजबूर लाइन में मजदूर

किसी को कैसे विश्वास दिलाए, कि हम कितनी मजबूरियों से गुजर रहें है। घर में जमा पूंजी को एक-एक कर कम होते देख बहुत सी जरूरत की वस्तुओं से दूरी बना रहे है। मैरा यह मानना है कि मध्मवर्गीय परिवारों और इससे नीचे का जीवन जीने वालो  के लिए शायद यह निर्णय अभिशाप की तरह होगा, ऐसे में वह व्यापारी जो एक दिन यह काम पड़ने पर अतिरिक्त लोगों को रोजगार देकर लाखों मदूरवर्गीय परिवारों का जो आसरा थे उन्होंने भी इस नोटबंदी के दौर में बहुत से लोगों से अपना पल्ला रुपयों की किल्लत के चलते छुड़ा लिया है। वह मजदूर वर्ग जो रोज काम की तलाश में घर से निकलता है, आज महीने भर काम न मिलने के कारण घर में बिना सब्जी के सूखी रोटी चाब रहा है। परिवार में बुजुर्गों और बच्चों को विश्वास दिला रहा है कि अब अच्छे दिन आएंगे। जैसे-जैसे एटीएम या बैंक से रुपये  निकालने वालों की लाइन दिन-प्रतिदिन लम्बी हुई है ठीक उसी प्रकार गरीबी रेखा से नीचे आने वाले गरीबों को राशन बांटने वाली दुकान पर लाइनों में लोगों की संख्या में तीन गुना इजाफा हुआ है।
कुछ मध्यमवर्गीय ऐसे लोग भी है जो स्थिति को सुधरने की बांट देख रहे है। जो सजग नागरिक और नेताओं पर विश्वास रखने वाले बहुत से बढ़े-लिखे लोग भयभीत नहीं भी होना चाहते है। सवा महिनों तक घर में रखे राशन पर विश्वास करते हुए और बैंके में जमा पूंजी पर विश्वास के चलते किसी प्रकार गांड़ी तो चला पा रहे है, लेकिन रफतार से कतरा रहे है।  
विश्व में जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे नम्बर के देश और एक सौ तीस करोड़ जनसंख्या वाले देश के लिए देश के प्रधानमंत्री का यह निर्णय आम लोगों की जरूरतों से बड़ा नहीं हो सकता। यदि किसी देश का नागरिक परेशानी में रहेगा तो ऐसे में देश की कमान को अपने हाथ में लेने वाले की चिंताा, प्राथमिकता राष्ट्र की जनता होेनी चाहिए। बहुत सी ऐसी परेशानियां है, जो दिखाई नहीं देती, कुछ ऐसी दिक्कते है जो खुद पनप जाती है। ऐसी स्थिति क्यों आती है, इस पर देश के पास मुक्कमल जवाब या व्यवस्था होनी चाहिए।
कुछ लोगों का मानना हो कि यह सब कालाधन को कम करने या कालाधन को पकड़ने के लिए किया जा रहा है, तो ऐसे में क्या हमारे पास एक मात्र यही विकल्प बचा था। यदि हम आय की जांच करना चाहते है तो इसके लिए भी नीति स्पष्ट होनी चाहिए। एक ओर सरकार कालाधन को खत्म करना चाहिए या यू कहे की काला धन रखने वाले कुबेरों को पकड़ना चाहती है तो ऐसे में कुछ के चारों ओर सरकार क्यों घूम रही है, बहुत सी सूचियां सरकार की जानकारी में हैं, उन पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा ? जो बड़ी कम्पनियां है जो गबन करती है उनसे भरपाइ क्यों नहीं की जाती ? यदि कोई घोटाला होता है तो ऐसे में उस रकम की छतिपूर्ति  उसी व्यक्ति से क्यों नहीं की जाती ? बहुत सारे नेता ऐसे है जिनकी सम्मपत्ति कुछ ही सालों में कई सौ गुना हो गई उस से जवाब क्यों नहीं मांगा जाता ? 70 प्रतिशत जनसंख्या आज भी ऐसी है जो अपना जीवन बसर कर रही है। रॉयल जीवन जीने की आशा तो ना ही की जाएं तो अच्छा है। भारत का जीवन स्तर पर कोई बात नहीं होती, लोगों को रोजगार देने की कोई बात नहीं होती, मानव संसाधन मंत्रालय कितनी सुस्ती से काम करता है सब हमारे सामने है यदि व्यवस्था बूढ़ी हो गई है तो ऐेसे में इसे नौजवानों के हाथों में सौप देना चाहिए।  
एक मत यह भी निकल कर आ रहा है कि सरकार राष्ट्र को डिजिटल बनाना चाहती है। कौन ऐसा व्यक्ति नहीं है जो हर काम को सुगमता से न करना चाहता हो, यदि कोई भी व्यवस्था उसके काम को आसान बनाती है तो जनता उसको अपनाने से नही ंचूकते। लेकिन दिक्कत यह है कि देश के बहुत से शहरों में लाइट की स्थिति अभी ठीक नहीं है। इस नोट बंदी के दौर शहरों की बड़ी-बड़ी दुकानों पर भी कार्ड से पेमेंट नहीं हो पा रहा है। हमारी नीति किसी भी व्यवस्था को लाने से पहले हम पूर्ण तैयारी के साथ काम करना चाहिए। जो सरकार की बड़ी चूक रही।
कालधन आया, क्या नहीं आया सरकार जाने, लेकिन आया तो उसका फायदा आम जनता को क्या होगा, नहीं आया तो जनता को इतने दिन क्याे परेशान किया। सवाल अनेक है जो शायद हमे सरकार से नहीं ....सरकार को खुद से पूछने चाहिे। आम जनता को अधिकार के नाम पर क्या मिला है। सब कुछ शायद कुछ नहीं। विचार का प्रश्न है विचार कीजिगा..........

Monday, 8 February 2016

जनसंख्या और अधिकार

देश में कितनी जनसंख्या है। कितनी नित जनसंख्या रोज़ बढ़ रही है, क्यों बढ़ रही है ? कितनी प्रतिशत के साथ बढ़ रही है। इस बढ़ती जनसंख्या का कोई देश क्या करेंगा ? क्या कभी संसद में इस मुद्दे पर किसी साहसी व्यक्ति या जनसेवक ने सोचने की जुगत की। नहीं अभी तक तो नहीं और शायद आने वाले कई दश्कों तक इस समस्या पर कोई विचार भी शायद कोई राजनैतिक पार्टी करें। जनसंख्या बढ़ रही है इस पर सब अपने विचार देते है। क्यों बढ़ रही है। इसका जबाव भी हमारे पास है। और इस बढ़ती हुई जनसंख्या का क्या करना है और इस बढ़ती जनसंख्या का हम क्या करेंगे यह भी हम जानते है।

सरकार या राजनीति में आने वालो के लिए यह जनता ठीक इसी प्रकार है जैसे सरकार की किसी बड़ी कम्पनी में रोजगार पाना। अधिक जनसंख्या होने का मतलब है ज्यादा सीट और ज्यादा सीट का मतलब ज्यादा लोग इस प्रोफेशन में अपना हाथ आजमा सकते है। राजनेता जनसंख्या को शायद इसी आइने से देखते होंगे। राजनेताओं को पता है कि जनता क्या चाहती है, और राजनेताओं की जरूरत क्या है। हम सब एक दूसरे पर अपनी अपनी निहित कुछ जरूरतों के लिए जुड़े हुए है। हमारी जरूरते राजनेता पूरे करेंगे और हम राजनेता की रोजी रोटी के इंतेजाम के लिए अपना एक खोटा वोट बदले में दे देंगे। यहां पर भी चीजें नियोजित की जाती है। वोटों की राजनीति नहीं इन्हें नियोजित किया जाता है। कभी सुनेहरे अवसर देकर, कभी सुनेहरे लुभावने वादे देकर, वादें पुरानी फिल्मों में पूरे नहीं होते थे। लेकिन अब पैसा इतना आने लगा है कि कहा छुपाएँ। जहां कम होने के चलते कुछ पैसा लोग कल्याण में खर्च कर दिया जाता है। आज भी जनता इतनी मासूम है कि वह सोचती है कि चलो सरकार से कुछ तो मुक्त में मिला। क्या किसी की वोट की चोट में दम हो सकता है अभी भी जनता इस बात को नहीं जाती है। हां यह जरूर जानती है कि वोट मेरा हक है वोट मेरा अधिकार है जो मुझ से कोई नहीं छीन सकता है। वैसे तो किसी का कुछ भी छिन सकता है, जैसे घर, कार, खेत खलियान, जमीन कोई ना कोई छीन सकता है लेकिन वोट एक ऐसे अधिकार है शायद जिसे कोई नहीं छीन सकता है यही कारण है कि लोग वोट की चोट मारने के चक्कर में सारे दिन धूप, बादल या बारिश के बिना ही घंटो खड़े रहते है। जिन स्थानों पर जितनी कम जागरूकता है वहा उतनी ही बड़ी लाईन लगी मिलती है। इस बात में भी कोई दो राय नहीं है कि दूररस्त स्थानों पर जो वोट की लाईन लगती है वह अपने उम्मीदवार को जिताने के साथ-साथ अपने पहली वार मिले अधिकार को भी महसूस करना चाहते है कि वह उसे किस प्रकार महसूस कर सकते है। 

Sunday, 16 August 2015

कलाम साहब आप सदैव जीवित रहेंगे।

हम सब भौतिक वाद की आंधी दौड़ में अोंधे मूंह भागे जा रहे है। कहा जा रहें हैं... पता नहीं। आज सभी को सभी साधन चाहिए। चाहे उससे दूसरों को फायदा हो या ना हो लेकिन घर, परिवार और अपने हितों तक लोगों की मानसिकता बन गई है।  देश में यदि इस तरह के लोगों को खोंजोगे तो पाओं गे कि कुछ ही उदाहरण हमारे आस पास है। जो जीवन को जीते है। जो लोग जीवन को इंजाय करना चाहते है। उनका दूसरों से सरकार कम ही रहता है। डॉ. कलाम जो बड़े पदो पर रहे लोगों उनकी सम्पत्ति के बारे में जानना चाहते है। इसी जिज्ञासा के साथ मेरा भी मन करा की कुछ कलाम साहब के बारे में खोजा जाए। तो पता चला कि  आम जिंदगी में बेहद सरल रहेने वाले कलाम के पास न तो कोई जायदादा थी और ना ही कोई सम्पत्ति जिस पर विवाद या दावेदारी की जा सके। देश देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजेपी अब्दुल कलाम के पास सिर्फ चंद जरुरत की चीजें ही थी और बहुत ज्यादा भौतिक चीजें उनके पास नहीं थी। उनके पास जो चीजें थी उसमें 3200किताबें, एक रिस्टवॉच, छह शर्ट, चार पायजामा, तीन सूट और मोजे की कुछ जोड़ियां थी। हैरानी की बात तो यह है कि उनके पास पास टीवी, कार ,एयर कंडीशनर  और फ्रीज तक नहीं था। उन्होंने विलासितापूर्ण जीवन जीया और ना ही वह घोर अभाव में रहे । उनकी कमाई का मुख्य स्रोत वह रॉयल्टी था जो उनकी लिखी चार किताबों से उन्हें हासिल होती थी। उन्हें पेंशन भी मिलता था। गौर हो कि देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का निधन बीते 27 जुलाई को शिलांग में हुआ था। उनके पार्थिव शरीर को तमिलनाडु के रामेश्वरम में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ 30 जुलाई को सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया।
कलाम साहब आप सदैव जीवित रहेंगे। हमारी यादों में हमारी बातों में।।

अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष - 2023

भारत गावों का, किसान का देश है। भारत जब आज़ाद हुआ तो वह खण्ड-2 था, बहुत सी रियासतें, रजवाड़े देश के अलग-अलग भू-खण्डों पर अपना वर्चस्व जमाएं ...