Monday, 30 December 2013

युवा सपने और सपनों की उड़ान

पॉश ने कहा था कि “सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना”, सपने जीवित रहने चाहिए ! उनके जीविका चलती रहनी चाहिए। सपनों की सांसो में ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति का संचार होते रहना चाहिए। सपनों को महनत की जरूरत होती है। कुछ सपने बिना महनत के भी इंजाए किए जाते है। लेकिन सपनों को बिना महनत इंजाए करना भी सभी के बस की बात नहीं। इन पर किसी का ज़ोर नहीं, ये कब आते है कब जाते है किसी को कानों कान ख़बर नहीं देते। खोजी पत्रकारिता भी इन्हें छूने की जुगत तक नहीं कर पाती है। सपना देखना पर भी कॉपी राइट होना चाहिए ताकि कोई किसी का सपना न चुरा सके। सपना देखना मौलिक अधिकार होना चाहिए ताकि सभी को सपने देखने का समान अवसर प्राप्त हो सके। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने सपनों के संदर्भ में कहा है कि सपने वह नहीं जो सोते वक्त देखे जाए, सपने तो वह है जो सोने ना दे। हम भी इन्हीं सपनों की बात कर रहे है, समाज में हर वर्ग का, व्यक्ति विशेष का अपना सपना होता है। जिसे वह पाना, चाहता है जीना चाहता है। इंजाए करना चाहता है। लेकिन सपनों की दुनिया से दूर होता युवा अपने को वर्तमान समय में अलग थलग पा रहा है। जीवन की गुत्थी जटिल होती सी दिखाई दे रही है।
वर्तमान परिपेक्ष्य में सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि युवा सपने ज्यादा देखता है, उन पर अमल नहीं करना चाहता, सपनों को साकार तो करना चाहता है लेकिन परिश्रम नहीं करना चाहता। सपनों में वह खुद महरूम होना चाहता है, महनत किराए पर या किस्तों पर करना चाहता है। युवा सपने साकार करने में नाकाम हो रहा है। क्यूं हो रहा है बड़ा प्रश्न है ? हर बार महनत करने के लिए एक शुभ मुहरत की आवश्यकता महसूस करता युवा किस तरह वास्तविक दुनिया या मंजिल से कैसे दूर हो जाता स्वयं वह खुद भी नहीं जानता।
अब सपने देखने की सुविधाएं बढ़ गई है। सपने हाई-टेक हो गए है। धरातल से युवाओं का संबंध कोसों दूर है। जिसकी हकीकत बनने और बनाने के लिए एक लम्बी प्लेनिंग की जरूरत महसूस की जाने लगी है। कम्पटीशन का दौर है। शॉट-कट के इस जमाने में प्लेनिंग भी मोबाइल, लेपटॉप और आइपॉड पर अपडेट हो रही है। जैसे आज गणित की गुत्थियों को हल कर युवाओं ने मोबाइल को जेब में रख लिया है। कुछ युवा सुविधाओं का लाभ पा हजारों-लाखों प्रतियोगियों को दिन-प्रतिदिन पीछे छोड़ते हुए बहुत दूर निकल चुके है। उनकी उम्मीदे, इच्छाएं भी असीमित है। जो न तो इंग्ति की जा सकती है और न ही व्यक्त।
आज सुविधाएं मुट्ठी में है। ऐसे में युवाओं को सुविधाओं से दूर कैसे रखा जा सकता है। लोगों की मुट्ठी में दुनिया को देने का सपना साकार करते हुए रिलांस करोड़ो- अरबों की कमाई कर चुका है। आज सब कुछ सबका है। युवाओं को नए आइडिया सुझाता आइडिया, प्रतियोगिता की दौड़ में ऐडी-चोटी का जोर लगा आगे निकल जाना चाहता है। पूजीवाद के इस दौर में सब अपने-अपने जुगत में लगे है लोगों की जिंदगी को इंजाए करने के हजारों विकल्प बाजार सुजा रहा है। लोगों को इंजाय कराने के लिए बिग टीवी, टाटा स्काए लाईफ को झिगालाला कराने में लगे है। जो युवा इस बाजारीकरण का हिस्सा है। उनके सपने सजोने और बुनने में यह भी कही हद तक सहयोग देने में सफल साबित हो रहे है।
तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था में युवाशक्ति का बड़ा योगदान है। जो कि किसी भी देश की सबसे बड़ी सम्पत्ति मानी जाती है। भारत में युवाओं का प्रतिशत भारतीय जनसंख्या में सबसे ज्यादा है। कहा जाता है कि किसी भी देश की कायाकल्प बदलने में युवाओं का अहम योगदान होता है। वरन भारत में भी यह स्थिति अपने चरम पर है जहां युवा अपने मनोबल से दुनिया जीतने के जुगत में हैं।
प्रतिभाग दिखाने के हजारों मंच युवाओं का इंस्तेजार कर रहे है। हजारों युवा अपने नाम का डंका बजा मां-बाप की तपस्या का उदाहरण बन रहे है। हजारों युवा देश सेवा कर अपने प्राणों के बलिदानों की आहुति देने को तैयार है। इन सब के बाद भी युवाओं की एक बड़ी जनसंख्या की मंजिल, रास्ता कुछ नहीं है। जिन्हें आज की ख़बर नहीं कल का पता नहीं, आर्थिक मंदी से जूझता युवा गलत रास्तों का आश्र्य लेना क्यूं चाहता है ? अच्छा-बुरा में फर्क करना क्यों नहीं चाहता ? यह बड़ा प्रश्न है ?
यदि किसी युवा से पूछा जाए की आप किसे अपना आर्दश मानते है तो ज्यादातर युवा खिस्यानी बिल्ली की तरह खम्भा नौचते हुए नजर आएंगे। आज आर्दशता का अभाव है। युवा फेसबुक, ट्वीटर, लिंकइन, गूगल प्लस से तो दोस्तों की सूची बढ़ा रहे है लेकिन आपसी दूरियां बढ़ रही हैं। लोगों की संवेदनाओं का चीर-हरण हो रहा है। भावनाएं सिमट रही है। जानकारी के इस अंबार में विकिलिक्स जैसे ई- सुविधाओं ने सूचनाओं को सब तक पहुंचा दिया है। अब लोग सूचनाओं, आकड़ों को अपने मस्तिष्क में संजोकर नहीं रखना चाहते उनका हिसाब किताब पर बात नहीं करता चाहते। तकनीकि ने युवाओं को मानसिक चतुरता में तो त्वरिक कर दिया है लेकिन उन्हें शारीरिक अपंग बना दिया है, जिसके प्रयोग से शारीरिक क्षमता/ शक्ति का ह्रास हो रहा है।
पूजीवांद के इस दौर में दिखावेपन का बोल-बाला है। युवा की आंखों में बड़े-बड़े सपने है। बड़ी उम्मीदे है और इन उम्मीदों को पूरा करने की ओर बढ़ते छोटे-छोटे कदम कब काल कोठरी तक जा पहुंचते है, यह उन्हें खुद भी पता नहीं चलता। युवा रुवानितय की दौड़ में अंधे हुए नंगे पैर ऊचाइयों को छूने की चाह में सरपट दौड़ रहा है। जिनकी ना कोई मंजिल है ना कोई ठिकाना। आज आधी आबादी से ज्यादा युवा दिशाहीन है, उन्होंने न तो मार्गदर्शन देने वाला है और न कोई मंजिल की राह में रौशनी दिखाने वाला। इस दुर्दशा के बड़ी हकदार अशिक्षा है जो कि ज्यादातर घर-परिवार में देखी जा सकती है। सरकार लोगों को साक्षर कर रही है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण पर जोर न के बराबर। यह एक बड़ा कारण है जिससे असमानताए बढ़ रही है। देश जब आजाद हुआ था तब प्रति व्यक्ति आमदनी 249.60 रुपये थी। आज प्रति व्यक्ति औसत आय 53,331 रुपये वार्षिक है। आम आदमी के हित में राजनैतिक पृष्ठभूमि कहा तक युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ रही है, इसका जीता जागता उदाहरण ये आंकड़े हैं।  
आज का युवा किस दिशा में जा रहा है इसका आइना मीडिया के सामने है। रोज़ ऐसे सैंकड़ों उदाहरण लिए जा सकते हैं जहां लूट-पाट, डकैती, चोरी, दंगा-फसाद, आपसी रंजिश आदि को देखे तो स्पष्ट नहीं होता कि युवाओं में असंतोष की भावना का संचार क्यों हो रहा है ? कारण चाहे जो भी हो, यह हमारे देश के भविष्य और युवा शक्ति के लिए गलत संकेत है। इस नूतन ऊर्जा को हमें एक साकारत्मक दिशा की ओर ले जाना होगा। तभी हम सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकतें हैं।
                                       - Surender kumar Adhana


युवा सपने और सपनों की उड़ान


पॉश ने कहा था कि “सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना”, सपने जीवित रहने चाहिए ! उनके जीविका चलती रहनी चाहिए। सपनों की सांसो में ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति का संचार होते रहना चाहिए। सपनों को महनत की जरूरत होती है। कुछ सपने बिना महनत के भी इंजाए किए जाते है। लेकिन सपनों को बिना महनत इंजाए करना भी सभी के बस की बात नहीं। इन पर किसी का ज़ोर नहीं, ये कब आते है कब जाते है किसी को कानों कान ख़बर नहीं देते। खोजी पत्रकारिता भी इन्हें छूने की जुगत तक नहीं कर पाती है। सपना देखना पर भी कॉपी राइट होना चाहिए ताकि कोई किसी का सपना न चुरा सके। सपना देखना मौलिक अधिकार होना चाहिए ताकि सभी को सपने देखने का समान अवसर प्राप्त हो सके। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने सपनों के संदर्भ में कहा है कि सपने वह नहीं जो सोते वक्त देखे जाए, सपने तो वह है जो सोने ना दे। हम भी इन्हीं सपनों की बात कर रहे है, समाज में हर वर्ग का, व्यक्ति विशेष का अपना सपना होता है। जिसे वह पाना, चाहता है जीना चाहता है। इंजाए करना चाहता है। लेकिन सपनों की दुनिया से दूर होता युवा अपने को वर्तमान समय में अलग थलग पा रहा है। जीवन की गुत्थी जटिल होती सी दिखाई दे रही है।
वर्तमान परिपेक्ष्य में सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि युवा सपने ज्यादा देखता है, उन पर अमल नहीं करना चाहता, सपनों को साकार तो करना चाहता है लेकिन परिश्रम नहीं करना चाहता। सपनों में वह खुद महरूम होना चाहता है, महनत किराए पर या किस्तों पर करना चाहता है। युवा सपने साकार करने में नाकाम हो रहा है। क्यूं हो रहा है बड़ा प्रश्न है ? हर बार महनत करने के लिए एक शुभ मुहरत की आवश्यकता महसूस करता युवा किस तरह वास्तविक दुनिया या मंजिल से कैसे दूर हो जाता स्वयं वह खुद भी नहीं जानता।
अब सपने देखने की सुविधाएं बढ़ गई है। सपने हाई-टेक हो गए है। धरातल से युवाओं का संबंध कोसों दूर है। जिसकी हकीकत बनने और बनाने के लिए एक लम्बी प्लेनिंग की जरूरत महसूस की जाने लगी है। कम्पटीशन का दौर है। शॉट-कट के इस जमाने में प्लेनिंग भी मोबाइल, लेपटॉप और आइपॉड पर अपडेट हो रही है। जैसे आज गणित की गुत्थियों को हल कर युवाओं ने मोबाइल को जेब में रख लिया है। कुछ युवा सुविधाओं का लाभ पा हजारों-लाखों प्रतियोगियों को दिन-प्रतिदिन पीछे छोड़ते हुए बहुत दूर निकल चुके है। उनकी उम्मीदे, इच्छाएं भी असीमित है। जो न तो इंग्ति की जा सकती है और न ही व्यक्त।आज सुविधाएं मुट्ठी में है। ऐसे में युवाओं को सुविधाओं से दूर कैसे रखा जा सकता है। लोगों की मुट्ठी में दुनिया को देने का सपना साकार करते हुए रिलांस करोड़ो- अरबों की कमाई कर चुका है। आज सब कुछ सबका है। युवाओं को नए आइडिया सुझाता आइडिया, प्रतियोगिता की दौड़ में ऐडी-चोटी का जोर लगा आगे निकल जाना चाहता है। पूजीवाद के इस दौर में सब अपने-अपने जुगत में लगे है लोगों की जिंदगी को इंजाए करने के हजारों विकल्प बाजार सुजा रहा है। लोगों को इंजाय कराने के लिए बिग टीवी, टाटा स्काए लाईफ को झिगालाला कराने में लगे है। जो युवा इस बाजारीकरण का हिस्सा है। उनके सपने सजोने और बुनने में यह भी कही हद तक सहयोग देने में सफल साबित हो रहे है।तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था में युवाशक्ति का बड़ा योगदान है। जो कि किसी भी देश की सबसे बड़ी सम्पत्ति मानी जाती है। भारत में युवाओं का प्रतिशत भारतीय जनसंख्या में सबसे ज्यादा है। कहा जाता है कि किसी भी देश की कायाकल्प बदलने में युवाओं का अहम योगदान होता है। वरन भारत में भी यह स्थिति अपने चरम पर है जहां युवा अपने मनोबल से दुनिया जीतने के जुगत में हैं।प्रतिभाग दिखाने के हजारों मंच युवाओं का इंस्तेजार कर रहे है। हजारों युवा अपने नाम का डंका बजा मां-बाप की तपस्या का उदाहरण बन रहे है। हजारों युवा देश सेवा कर अपने प्राणों के बलिदानों की आहुति देने को तैयार है। इन सब के बाद भी युवाओं की एक बड़ी जनसंख्या की मंजिल, रास्ता कुछ नहीं है। जिन्हें आज की ख़बर नहीं कल का पता नहीं, आर्थिक मंदी से जूझता युवा गलत रास्तों का आश्र्य लेना क्यूं चाहता है ? अच्छा-बुरा में फर्क करना क्यों नहीं चाहता ? यह बड़ा प्रश्न है ?यदि किसी युवा से पूछा जाए की आप किसे अपना आर्दश मानते है तो ज्यादातर युवा खिस्यानी बिल्ली की तरह खम्भा नौचते हुए नजर आएंगे। आज आर्दशता का अभाव है। युवा फेसबुक, ट्वीटर, लिंकइन, गूगल प्लस से तो दोस्तों की सूची बढ़ा रहे है लेकिन आपसी दूरियां बढ़ रही हैं। लोगों की संवेदनाओं का चीर-हरण हो रहा है। भावनाएं सिमट रही है। जानकारी के इस अंबार में विकिलिक्स जैसे ई- सुविधाओं ने सूचनाओं को सब तक पहुंचा दिया है। अब लोग सूचनाओं, आकड़ों को अपने मस्तिष्क में संजोकर नहीं रखना चाहते उनका हिसाब किताब पर बात नहीं करता चाहते। तकनीकि ने युवाओं को मानसिक चतुरता में तो त्वरिक कर दिया है लेकिन उन्हें शारीरिक अपंग बना दिया है, जिसके प्रयोग से शारीरिक क्षमता/ शक्ति का ह्रास हो रहा है।
पूजीवांद के इस दौर में दिखावेपन का बोल-बाला है। युवा की आंखों में बड़े-बड़े सपने है। बड़ी उम्मीदे है और इन उम्मीदों को पूरा करने की ओर बढ़ते छोटे-छोटे कदम कब काल कोठरी तक जा पहुंचते है, यह उन्हें खुद भी पता नहीं चलता। युवा रुवानितय की दौड़ में अंधे हुए नंगे पैर ऊचाइयों को छूने की चाह में सरपट दौड़ रहा है। जिनकी ना कोई मंजिल है ना कोई ठिकाना। आज आधी आबादी से ज्यादा युवा दिशाहीन है, उन्होंने न तो मार्गदर्शन देने वाला है और न कोई मंजिल की राह में रौशनी दिखाने वाला। इस दुर्दशा के बड़ी हकदार अशिक्षा है जो कि ज्यादातर घर-परिवार में देखी जा सकती है। सरकार लोगों को साक्षर कर रही है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण पर जोर न के बराबर। यह एक बड़ा कारण है जिससे असमानताए बढ़ रही है। देश जब आजाद हुआ था तब प्रति व्यक्ति आमदनी 249.60 रुपये थी। आज प्रति व्यक्ति औसत आय 53,331 रुपये वार्षिक है। आम आदमी के हित में राजनैतिक पृष्ठभूमि कहा तक युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ रही है, इसका जीता जागता उदाहरण ये आंकड़े हैं।  आज का युवा किस दिशा में जा रहा है इसका आइना मीडिया के सामने है। रोज़ ऐसे सैंकड़ों उदाहरण लिए जा सकते हैं जहां लूट-पाट, डकैती, चोरी, दंगा-फसाद, आपसी रंजिश आदि को देखे तो स्पष्ट नहीं होता कि युवाओं में असंतोष की भावना का संचार क्यों हो रहा है ? कारण चाहे जो भी हो, यह हमारे देश के भविष्य और युवा शक्ति के लिए गलत संकेत है। इस नूतन ऊर्जा को हमें एक साकारत्मक दिशा की ओर ले जाना होगा। तभी हम सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकतें हैं।                                                                                                                      -       सुरेंद्र कुमार अधाना

Saturday, 14 September 2013

साम्प्रदायिक सद्भावना हम सब की जिम्मेदारी


साम्प्रदायिक तनाव के दंश ने न केवल मुज़्फ़्फ़रनगरवासियों को बल्कि आसपास में स्थित कई जिलो को भी प्रभावित किया है। इस प्रकार की घटनाओं ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है, कि हिंसा कभी भी छोटी या बड़ी नहीं होती। जितने अशांत दिमाग इसमें जुड़ जाते है, यह और बड़ी/विशाल होती चली जाती है। इसका प्रमाण भी सर्वज्ञ है, उत्तर भारत के जिलो में कुछ ऐसे गांव हैं जो कि हमेशा से ही विवादों से रहे है। जिनकी पहचान, उनके कारनामें से जानी जाती है। उन गांवों के नाम पहले से ही पुलिस-प्रशासन की फाइलों में दर्ज है। ऐसे स्थानों को राज्य सरकार हमेशा से ही अपनी निगरानी में रखती है, ताकि सीधा सम्पर्क साधा जा सके और प्रशासन को जल्द इक्त्ला कर माहौल को नियंत्रण में लिया जा सके। ऐसे में प्रशासन की दूरदर्शिता पर सवाल करना ठीक नहीं होगा। लोगों में अशांति किस कारण है इस पर गौर किया जाना आवश्यक है।
मुज़्फ़्फ़रनगर में जो माहौल पैदा हुआ और जिस तरह से वहां कार्यवाई की गई। उसे ज्यादा शक्ति के साथ लेने कि आवश्यकता थी, लेकिन विवाद इतना तूल पकड़ेगा। इसकी जानकारी न तो मुज़्फ़्फ़रनगर प्रशासन को थी और न ही पंचायत में शिरकत कर रहे मुखयाओं को। स्थिति इतनी गंभीर भी नहीं होती। यदि पंचायत के बाद ये उपद्रवी तत्व सक्रिय न हुए होते। ये असामाजिक तत्व कहां पनपते है ? क्या करते है ? कहां जाते है ? और किन क्रियाओं में लिप्त होते है ? इन सब की जानकारी पड़ौस में रहने वाले लोगों को जरूर होती होगी। लेकिन किसी कारणों के चलते इन्हें दबना या छुपाना कितने हद तक नुकसान देह हो सकता है। इसकी कल्पना से भी डर लगता है। ऐसे में हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि हम एक आदर्श नागरिक की तरह कार्य करें। आस-पास कुछ असामाजिक हो रहा है। तो उसकी सूचना व्यवस्था को दें। समाज आप से बनाता है। ऐसे में प्रत्येक जन की जिम्मेदारी बनती है कि वह अमन–चैन बनाएं रखे और यदि कोई व्यक्ति इन सब के विपरीत होता है तो उस पर सख्ती की जाएं।
मुज़्फ़्फ़रनगर के बाद मेरठ में भी कई दिन तक तनावपूर्ण माहौल रहा। कई दिनों तक स्कूल-कॉजिल बंद रखे गए। एक निर्दोष बच्चे को हिंसा का हिस्सा बना लिया गया। अमन-चैन बनाएं रखने के लिए बच्चे के पिता राकेश कौशिक ने रुंधे हुए गले से लोगों को समझाते हुए कहा कि “पथराव और हंगामा करने से मेरा ‘करन’ वापस नहीं आएगा” इसलिए आप शांत हो जाए। ऐसे में हमें इन लोगों से सीखना चहिए जो समाज के लिए आर्दश है, जो हर कीमत पर एकता, सद्भाना और अमन चाहते हैं।
 हमें सोचना चाहिए कि हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं। देश के अधिकांश लोग यह कतई नहीं चाहते कि माहौल खराब हो। उसके अपनों का खून बहे। आम व्यक्ति की अपनी समस्याएं हैं, उसके अपने दर्द हैं, घर परिवार है। इन चीजों को व्यवस्थित करने में ही वह अपना जीवन गवा देता है। प्रत्येक साम्प्रदायिक घटनाओं में आम व्यक्ति ही पिस्ती है। दंगे-फसाद में उनकी रोजी-रोटी छिन जाती है। ऐसे में खुद को संकट में डाल कर ये व्यक्ति असामाजिकता नहीं फैला सकते। बात स्पष्ट है कि असामाजिकता सोची समझी साजिश है। दंग-फसादों से पूरा क्षेत्र पिस्ता है। जिले की छवि खराब होती है। राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय पूंजी जो विकास के लिए लगनी होती है, वह खराब माहौल के कारण प्रभावित होती है। मेरठ शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है लेकिन असुरक्षा के इस माहौल से प्रतिकूल प्रभाव तो पड़ेगे ही। ये कुछ ऐसे तत्व है जो विकास की गति को धीमी कर उस क्षेत्र को कई साल पीछे धकेल देते है। जिसकी भरपाई के लिए कभी-कभी दश्कों लग जाते है।
किसी भी विशाल राष्ट्र में छोटी-मोटी घटना तो होती ही रहती है। जब ये छोटी-मोटी घटना ही बड़ी साम्प्रदायिक वारदात में बदल जाती है, तो चिंता का विषय बना जाती है। गुजरात में सन् 2002 में हुए दंगों के सबक आज हमारे सामने है। कि हम साम्प्रदायिकता को रोकने में कितने सकक्षम है। 121 करोड़ जनसंख्या वाले देश में व अमन व एकता को बनाएं रखे के लिए चुनौती आसान नहीं है। ऐसे में सामाज की सक्रियता को बढ़ाना अतिआवश्यक है। समाज को भी जाति-धर्म के भेद से ऊपर उठकर भारत की एकता, शांति और सद्भावना के लिए एकजुट होना पड़ेगा। अपनी सजगता और सक्रियता को बढ़ाना होगा। समय आ गया है कि हम देश की अखंडता, धर्मनिपेक्षता व अमन-शान्ति के साथ देश की नींव बने। उसे और मजबूती प्रदान करें। ताकि किसी भी प्रकार का तत्व देश की नींव को खोखला करने का सहस न कर सके।
सुरेंद्र कुमार अधाना,

9411616463

हिंदुस्तान में हिंदी की दशा

आज 14 सितम्बर यानि हिंदी दिवस .... एक बात बहुत दिनों तक परेशान करती रही थी..... कि हम हिंदी में बिन्दी को आधा न और आधा म वाले अलग-अलग शब्दों के स्थान पर कैसे प्रयोग कर सकते है । मीडिया में कार्य करते हुए कई ऐसे शब्द मिले जिन पर अभी भी शोध जारी है, कि इनका सही लेखन कैसे हो। खैर.... बात हिंदी दिवस की हो रही थी। आज हिंदी दिवस के मौके पर एक दोस्त को जन्मदिवस की हिंदी में शुभकामनाएं दी और साथ ही साथ हिंदी प्रेमी की हेसित से हिंदी दिवस की शुभकानाएं दे डाली। जवाब में आता है शुक्रिया और आगे लिखा था, "कि बस इतनी ही हिंदी आती है।" पढ़ कर दुख हुआ..... बस एक शब्द हिंदी का जान कर यह हिन्दुस्तानी बाला (लड़की) कैसा अपना काम चलाती होगी। दुख इस बात का भी है कि जो लोग हिंदी की उंगलियां पकड़ कर अन्य भाषाओं को जान पाते है वही कई बार कह देते है प्लीज कम इन इग्लिश, या आई डांट नॉ हिंदी। ऐसे में आप खुद को तो शायद खुश कल लेते होंगे पर अपने पहचान हम खो देते हैं। हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए की हिंदी हमारी मां है। हमारा मूल हमारी हिंदी ही है इसके बिना हमारा अस्तित्व नहीं पहचाना जा सकता। इस बनावटी हॉए-हैल्लो कलचर से आप को संतुष्टि तो मिल जाएंगी लेकिन अहसास आपको अपनी मात् भाषा में ही मिलेंगे ।

अशांत दिमाग की उपज है ये हिंसा

साम्प्रदायिक तनाव के दंश ने न केवल मुज़्फ़्फ़रनगरवासियों को बल्कि आसपास में स्थित कई जिलो को भी प्रभावित किया है। इस प्रकार की घटनाओं ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है, कि हिंसा कभी भी छोटी या बड़ी नहीं होती। जितने अशांत दिमाग इसमें जुड़ जाते है, यह और बड़ी/विशाल होती चली जाती है। इसका प्रमाण भी सर्वज्ञ है, उत्तर भारत के जिलो में कुछ ऐसे गांव हैं जो कि हमेशा से ही विवादों से रहे है। जिनकी पहचान, उनके कारनामें से जानी जाती है। उन गांवों के नाम पहले से ही पुलिस-प्रशासन की फाइलों में दर्ज है। ऐसे स्थानों को राज्य सरकार हमेशा से ही अपनी निगरानी में रखती है, ताकि सीधा सम्पर्क साधा जा सके और प्रशासन को जल्द इक्त्ला कर माहौल को नियंत्रण में लिया जा सके। ऐसे में प्रशासन की दूरदर्शिता पर सवाल करना ठीक नहीं होगा। लोगों में अशांति किस कारण है इस पर गौर किया जाना आवश्यक है।
मुज़्फ़्फ़रनगर में जो माहौल पैदा हुआ और जिस तरह से वहां कार्यवाई की गई। उसे ज्यादा शक्ति के साथ लेने कि आवश्यकता थी, लेकिन विवाद इतना तूल पकड़ेगा। इसकी जानकारी न तो मुज़्फ़्फ़रनगर प्रशासन को थी और न ही पंचायत में शिरकत कर रहे मुखयाओं को। स्थिति इतनी गंभीर भी नहीं होती। यदि पंचायत के बाद ये उपद्रवी तत्व सक्रिय न हुए होते। ये असामाजिक तत्व कहां पनपते है ? क्या करते है ? कहां जाते है ? और किन क्रियाओं में लिप्त होते है ? इन सब की जानकारी पड़ौस में रहने वाले लोगों को जरूर होती होगी। लेकिन किसी कारणों के चलते इन्हें दबना या छुपाना कितने हद तक नुकसान देह हो सकता है। इसकी कल्पना से भी डर लगता है। ऐसे में हम सब की जिम्मेदारी बनती है कि हम एक आदर्श नागरिक की तरह कार्य करें। आस-पास कुछ असामाजिक हो रहा है। तो उसकी सूचना व्यवस्था को दें। समाज आप से बनाता है। ऐसे में प्रत्येक जन की जिम्मेदारी बनती है कि वह अमन–चैन बनाएं रखे और यदि कोई व्यक्ति इन सब के विपरीत होता है तो उस पर सख्ती की जाएं।
मुज़्फ़्फ़रनगर के बाद मेरठ में भी कई दिन तक तनावपूर्ण माहौल रहा। कई दिनों तक स्कूल-कॉजिल बंद रखे गए। एक निर्दोष बच्चे को हिंसा का हिस्सा बना लिया गया। अमन-चैन बनाएं रखने के लिए बच्चे के पिता राकेश कौशिक ने रुंधे हुए गले से लोगों को समझाते हुए कहा कि “पथराव और हंगामा करने से मेरा ‘करन’ वापस नहीं आएगा” इसलिए आप शांत हो जाए। ऐसे में हमें इन लोगों से सीखना चहिए जो समाज के लिए आर्दश है, जो हर कीमत पर एकता, सद्भाना और अमन चाहते हैं।
 हमें सोचना चाहिए कि हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं। देश के अधिकांश लोग यह कतई नहीं चाहते कि माहौल खराब हो। उसके अपनों का खून बहे। आम व्यक्ति की अपनी समस्याएं हैं, उसके अपने दर्द हैं, घर परिवार है। इन चीजों को व्यवस्थित करने में ही वह अपना जीवन गवा देता है। प्रत्येक साम्प्रदायिक घटनाओं में आम व्यक्ति ही पिस्ती है। दंगे-फसाद में उनकी रोजी-रोटी छिन जाती है। ऐसे में खुद को संकट में डाल कर ये व्यक्ति असामाजिकता नहीं फैला सकते। बात स्पष्ट है कि असामाजिकता सोची समझी साजिश है। दंग-फसादों से पूरा क्षेत्र पिस्ता है। जिले की छवि खराब होती है। राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय पूंजी जो विकास के लिए लगनी होती है, वह खराब माहौल के कारण प्रभावित होती है। मेरठ शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है लेकिन असुरक्षा के इस माहौल से प्रतिकूल प्रभाव तो पड़ेगे ही। ये कुछ ऐसे तत्व है जो विकास की गति को धीमी कर उस क्षेत्र को कई साल पीछे धकेल देते है। जिसकी भरपाई के लिए कभी-कभी दश्कों लग जाते है।
किसी भी विशाल राष्ट्र में छोटी-मोटी घटना तो होती ही रहती है। जब ये छोटी-मोटी घटना ही बड़ी साम्प्रदायिक वारदात में बदल जाती है, तो चिंता का विषय बना जाती है। गुजरात में सन् 2002 में हुए दंगों के सबक आज हमारे सामने है। कि हम साम्प्रदायिकता को रोकने में कितने सकक्षम है। 121 करोड़ जनसंख्या वाले देश में व अमन व एकता को बनाएं रखे के लिए चुनौती आसान नहीं है। ऐसे में सामाज की सक्रियता को बढ़ाना अतिआवश्यक है। समाज को भी जाति-धर्म के भेद से ऊपर उठकर भारत की एकता, शांति और सद्भावना के लिए एकजुट होना पड़ेगा। अपनी सजगता और सक्रियता को बढ़ाना होगा। समय आ गया है कि हम देश की अखंडता, धर्मनिपेक्षता व अमन-शान्ति के साथ देश की नींव बने। उसे और मजबूती प्रदान करें। ताकि किसी भी प्रकार का तत्व देश की नींव को खोखला करने का सहस न कर सके।
- सुरेंद्र कुमार अधाना, 9411616463

Saturday, 31 August 2013

स्वतंत्रता के बदलते मायने...

            स्वतंत्रता के बदल गए मायने... अब भी लोग स्वंय को आजाद महसूस नहीं करतें। इसके पीछे सब की ब्यथा भिन्न-भिन्न है। कही किसी को कानून की जकड़ ने गरीबी दे दी। किसी के संविधानिक अधिकारों का गला घौंटा गया। कही किसी सरकारी विभाग में अपने हक के किसी व्यक्ति ने जीवन का बलिदान दे दिया। क्या ऐसे सक्श के परिजन स्वंय को स्वतंत्र महसूस करेंगे ? यदि करेंगे तो उसके मायने और विचार ओर लोगों से अलग होंगे। भारत की अंतरिक छवि उसके मंत्री, अधिकारी और तमाम सरकारी महकमों में बैठे सैकड़ों उन लोगों द्वारा बनती है जो कि हिंदुस्तान की कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को चलाने के लिए एक मजबूत स्तंभ हैं। यदि किसी गरीब व्यक्ति को अपना बीपीएल कार्ड बनवाने के लिए बेफ्जूल का समय, धन और हाथ-पैर जोड़ने के बाद भी मूंह की खानी पड़ती है तो उसके लिए 15 अगस्त या 26 जनवरी के कोई मायने नहीं होते। भारतीय सरकारी महकमें की वास्तविकता जानते हुए भी आला आधिकारी, मंत्री, नौकरशाही मौन बैठे रहते है। काम यू ही बदस्तूर जारी रहता है। कहा जाता है-पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया ....आडिया बहुत ही उम्दा किस्म का है। मैं यकीनन कह सकता हूं कि ये विचार किसी मंत्री को तो नहीं आया होगा। क्योंकि कुछ लोग देश की जनता को शिक्षित देखना ही नहीं चाहते। यदि अधिकारों की बात की जाए तो एक पढ़ा लिखा व्यक्ति भी देश के गौरव, मान-सम्मान और गरीमा के लिए उतनी शिद्दत से स्वंय को देश भक्त नहीं कहलाना चाहता। क्योंकि कही न कही किसी बात से वह भी आहत होता है। यदि अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसौदिया जैसे लोग आवाज़ बुलंद करते हैं तो मंत्री और सरकार को उसमें, उनके हित नजर आने लगते है। एक पढ़े लिखे नागरिक आए दिन पासपोर्ट बनवाने के ऑफिस के लिए चक्कर कांटते देखे गए है। जिनमें कुछ लोग तो ऐसे हैं जो सालों से लाईन में इसलिए लगते आ रहे है कि उनके पास पुलिस या पता बेरिफिकेशन करने वाले की जेब गरम करने के लिए रुपया नहीं है। ऐसे में कई सालों तक चक्कर काटने के बाद हताश नागरिक देश पर गर्व किस प्रकार कर सकता है। ये बात वे पढ़े लिखे अधिकारी भी जानते है कि क्यों किसी की फाईल बंद कर दी गई। या पासपोर्ट रद्द कर दिया। लेकिन कोई जहमत उठाने वाला नहीं है। हमारे यहां नागरिकता के मायने कुछ इस तरह है कि आप को जरूरत पासपोर्ट की होगी लेकिन कार्य आप के वोटिंग कार्ड के लिए ज्यादा शिद्दत से कराए जाते है। जिसमें हम आम नागरिक अपना ज्यादा हित खोजते है लेकिन वास्तविक हित तो कुछ ओर ही होता है। अब जनता भी सब जानती है सरकार भी सब जानती है। लेकिन अधिकारों की लड़ाई में आम व्यक्ति बौना पड़ जाता है जीत बाहुबलि की हो जाती है।

Monday, 19 August 2013

जनतंत्र, जनता और प्याज !

जनतंत्र की जनता की आंख में आंशू है। अब प्याज काटे तो भी और ना काटे तो भी। जनता जनतंत्र का मूंह ताक रही है। एक टक देख रही हैं कि जिस तरह से पानी का एक-एक टैक लोगों को जल सुलभ कराता है। ठीक उसी प्रकार आज-कल प्याज भी सुलभ हो रहा है। वह भी आप ही की जेब से यहां ज्यादा संवेदनशील होने की आवश्यकता नहीं .... और तंत्र चलाने वाले दावा भी ठोक रहे है कि सस्ता और स्वादिष्ट प्याज आप को सुलभ कराना अब सरकार का काम हो गया है। अभी तो प्याज महंगा हुआ है आने वाले समय में आप को नींबू, शलजम, आंवल, बैंगन और न जाने क्या-क्या भी आप के घरों तक सरकार लेकर आएगी इसकी तो कोई गारंटी नहीं लेकिन एक गारंटी है कि 2014 में होने वाले चुनाव में यह प्याज बहुत काम आने वाली है।
आम आदमी भी अब आम नहीं रह गया है। वह भी पार्टी का हिस्सा बन गया है। चाहे तो भी और न चाहे तो भी..... क्योंकि नहीं भी तो आम पार्टी तो उसके नाम का झंडा थामे हुए है ही। आम आदमी का काम आम आदमी पार्टी का काम और कर्म दोनों है। यह पार्टी के कार्यकर्ताओं की जुबानी है। यदि आम किसान की बात करें जो इस प्याज का पितामह है वह भी 60-70 के चक्कर में पड़ा हुआ है। ध्यान दिला दे कि प्याज बहुत ही जल्दी गलने-सड़ने वाली सब्जी है जिसका लम्बें समय तक भंडारन नहीं किया जा सकता और आम किसान के पास इतनी व्यवस्था भी नहीं होती है कि वह इसे महंगा होने तक किसी सुरक्षित जगह रख सके, लेकिन जमीनी हकीकत से भी आंख-मिचौली खेले बिना बता दू कि किसान एक ऐसा प्राणी हो जो कि अपनी फसल को पकने से पहने ही उसे बाजार तक ले जाने को उत्सुक होता है। ऐसे में छोटे और मंझोले किसान तो उसी समय अपनी सामग्री को बाजार में बेच देते है। बड़े किसान आर्थिक रूप से मजबूती का फायदा उठा लेते है। लेकिन आम आदमी की व्यथा बरकरार रहती है। अब प्याज मंडी पहुंच जाती है। यहां पर या तो आढ़ती या सरकार इनकी खरीद कर लेती है और इनका भंडारन कर लेती है। कुछ को इधर-उधर बेच दिया जाता है। सरकार को पता होना चाहिए कि उसे बाजार को भी नियंत्रण करना है। ऐसे में गैंद किसी दूसरे लालची के पाले में फैकने से बचना चाहिए जो कि इस बार शायद नहीं किया। इसी की वजह है कि आज प्याज हर दिन की सुर्खियों में छाई हुई है। सभी बड़े अखबारों और न्यूज़ चैनलों में बड़े-बड़े प्लेग या ग्राफिक्स का इस्तेमाल कर लोगों को प्याज दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि जिन लोगों से प्याज दूर हो गई है वह अपने टीवी सेट पर दिख रही प्यार को देख भर से ही काम चला लें।
                                          सुरेंद्र कुमार अधाना, स्वतंत्र पत्रकार  

Monday, 4 February 2013

स्वतंत्रता के बदलते मायने...


स्वतंत्रता के बदल गए मायने... अब भी लोग स्वंय को आजाद महसूस नहीं करतें। इसके पीछे सब की ब्यथा भिन्न-भिन्न है। कही किसी को कानून की जकड़ ने गरीबी दे दी। किसी के संविधानिक अधिकारों का गला घौंटा गया। कही किसी सरकारी विभाग में अपने हक के किसी व्यक्ति ने जीवन का बलिदान दे दिया। क्या ऐसे सक्श के परिजन स्वंय को स्वतंत्र महसूस करेंगे ? यदि करेंगे तो उसके मायने और विचार ओर लोगों से अलग होंगे। भारत की अंतरिक छवि उसके मंत्री, अधिकारी और तमाम सरकारी महकमों में बैठे सैकड़ों उन लोगों द्वारा बनती है जो कि हिंदुस्तान की कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को चलाने के लिए एक मजबूत स्तंभ हैं। यदि किसी गरीब व्यक्ति को अपना बीपीएल कार्ड बनवाने के लिए बेफ्जूल का समय, धन और हाथ-पैर जोड़ने के बाद भी मूंह की खानी पड़ती है तो उसके लिए 15 अगस्त या 26 जनवरी के कोई मायने नहीं होते। भारतीय सरकारी महकमें की वास्तविकता जानते हुए भी आला आधिकारी, मंत्री, नौकरशाही मौन बैठे रहते है। काम यू ही बदस्तूर जारी रहता है। कहा जाता है-पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया ....आडिया बहुत ही उम्दा किस्म का है। मैं यकीनन कह सकता हूं कि ये विचार किसी मंत्री को तो नहीं आया होगा। क्योंकि कुछ लोग देश की जनता को शिक्षित देखना ही नहीं चाहते। यदि अधिकारों की बात की जाए तो एक पढ़ा लिखा व्यक्ति भी देश के गौरव, मान-सम्मान और गरीमा के लिए उतनी शिद्दत से स्वंय को देश भक्त नहीं कहलाना चाहता। क्योंकि कही न कही किसी बात से वह भी आहत होता है। यदि अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसौदिया जैसे लोग आवाज़ बुलंद करते हैं तो मंत्री और सरकार को उसमें, उनके हित नजर आने लगते है। एक पढ़े लिखे नागरिक आए दिन पासपोर्ट बनवाने के ऑफिस के लिए चक्कर कांटते देखे गए है। जिनमें कुछ लोग तो ऐसे हैं जो सालों से लाईन में इसलिए लगते आ रहे है कि उनके पास पुलिस या पता बेरिफिकेशन करने वाले की जेब गरम करने के लिए रुपया नहीं है। ऐसे में कई सालों तक चक्कर काटने के बाद हताश नागरिक देश पर गर्व किस प्रकार कर सकता है। ये बात वे पढ़े लिखे अधिकारी भी जानते है कि क्यों किसी की फाईल बंद कर दी गई। या पासपोर्ट रद्द कर दिया। लेकिन कोई जहमत उठाने वाला नहीं है। हमारे यहां नागरिकता के मायने कुछ इस तरह है कि आप को जरूरत पासपोर्ट की होगी लेकिन कार्य आप के वोटिंग कार्ड के लिए ज्यादा शिद्दत से कराए जाते है। जिसमें हम आम नागरिक अपना ज्यादा हित खोजते है लेकिन वास्तविक हित तो कुछ ओर ही होता है। अब जनता भी सब जानती है सरकार भी सब जानती है। लेकिन अधिकारों की लड़ाई में आम व्यक्ति बौना पड़ जाता है जीत बाहुबलि की हो जाती है। 
                      - सुरेंद्र कुमार अधाना

अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष - 2023

भारत गावों का, किसान का देश है। भारत जब आज़ाद हुआ तो वह खण्ड-2 था, बहुत सी रियासतें, रजवाड़े देश के अलग-अलग भू-खण्डों पर अपना वर्चस्व जमाएं ...