Sunday, 15 September 2019

आज दूरदर्शन ने पूरे किए 60 साल

15 सितंबर 1959 में आज ही के दिन सरकारी प्रसारक के तौर पर दूरदर्शन की स्थापना हुई थी। भारत में दूरदर्शन का पर्याय टेलीविजन ही हैं। जबकि टेलीविजन शब्द को देखे तो वह दो शब्दों से मिलकर बना है टेली + विजन, जिसका अर्थ है दूर के दृश्यों का आँखों के सामने उपस्थित होना या दूर बैठे दर्शन करना है। तकीनिकी रूप से देखे तो दूरदर्शन रेडियो में प्रयुक्त होने वाली प्रोद्योगिकी का ही उन्नत रूप है। विश्व में टेलीविजन का सबसे पहला प्रयोग ब्रिटेन के जॉन एल. बेयर्ड ने 1925 में किया था।
भारत में टेलीविजन के इतिहास की यात्रा दूरदर्शन के इतिहास से ही शुरू होती है। आज भी दूरदर्शन का नाम सुनते ही अतीत की बहुत सी पुराने यादें ताज़ा हो जाती है है। आज भले ही टी.वी. चैनलस पर कार्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई हो, लेकिन दूरदर्शन की पहुंच को टक्कर दे पाना अभी भी किसी के बस की बात नहीं है। दूरदर्शन ने लोगों के घरों में नहीं दिल में राज किया है। जिसकी घुसपैठ घरों तक नहीं सीधे दिल पर तस्तक देने वाली है। आएंये याद करते है उन कुछ गौरव पलों को उन तिथियों को जो हमारे टीवी के इतिहास को ताज़ा करतीं हैं।
दूरदर्शन की स्थाुपना साल 15 सितंबर 1959 को हुई थी। दूरदर्शन से 15 अगस्त 1965 को प्रथम समाचार बुलेटिन का प्रसारण किया जो आज-तक जारी है। 1975 तक यह सिर्फ 7 शहरों तक ही सीमित था बाद में धीरे- धीरे इसके विस्तार और विकास को और तीर्वता प्रदान एसआईटीई SITE प्रोजेक्ट के माध्यम से मिली। दूरदर्शन की विकास यात्रा प्रारंभ में काफी धीमी रही लेकिन 1982 में रंगीन टेलीविजन आने के बाद लोगों का रूझान इस ओर ज्यादा बढ़ा। इसके बाद एशियाई खेलों के प्रसारण ने इस दिशा में क्रांति ही ला दी और इसी साल न केवल रंगीन टीवी आया साथ ही राष्ट्रीय प्रसारण भी प्रारंभ हुआ जो सबसे बड़ी उपलब्धी थी। बाद में हम पाते है कि दो राष्ट्रीय और 11 क्षेत्रीय चैनलों के साथ कुल दूरदर्शन के कुल 21 चैनल प्रसारित होते हैं, 14 हजार जमीनी ट्रांसमीटर और 46 स्टूकडियो के साथ यह देश का सबसे बड़ा प्रसारणकर्ता बन जाता है। हम लोग, बुनियाद, रामायण, महाभारत जैसे कार्यक्रमों ने दूरदर्शन की लोकप्रियता को बुलंदियों पर पहुंचाया साथ ही जन-जन को टेलीविजन से जोड़ने का काम किया।
एक दौर था जब दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम को देखने के लिए लोग दूर दूर से आते थे। छोटे से पर्दे पर चलती बोलती तस्वीरें दिखाने वाला बिजली से चलने वाला यह डिब्बा लोगों के लिए कौतुहल का विषय था। जिसके माध्यम से देश की कला और संस्कृति को लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाता था। दूरदर्शन सरकारी प्रसारण सेवा का एक अभिन्न अंग था।
दूरदर्शन ने देश में तब तहलका मचा दिया था, जब 1986 में श्री रामानंद सागर की 'रामायण' और श्री रवी चोपड़ी की ‘महाभारत’ की शुरुआत हुई। प्रसारण के दौरान हर रविवार को सुबह देश भर की सड़कों पर कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसर जाता था। इस कर्यक्रम को देखने के लिए लोग की भारी संख्या में भीड़ उमड़ जाती थी। लोग सड़कों पर उस समय यात्रा नहीं करते थे। ये बात आज के युवाओं को भले ही अटपटी लगे लेकिन ये सत्य है कि इस कार्यक्रम के शुरु होने से पहले लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करके अगरबत्ती और दीपक जलाकर रामायण का इंतजार करते थे और एपिसोड के खत्म होने पर बकायदा प्रसाद बांटते थे। यह टीवी का प्रेम और आदर वाली भावन केवल दूरदर्शन ने ही पैदा की जो शायद भुलाई नहीं जा सकती।

Friday, 13 September 2019

हिन्दी भाषा की अपनी सीमाएं

जरा गौर करेंगे तो गली, मौहल्ले, नुक्कड़ आदि की दिवारों पर आप अंग्रेजी सीखने और चंद घण्टों में आप को पारंगत करने के दावे ठौकने वाले वाक्य आकृषित रंगों में ऊभरे हुए अक्षरों में आसानी से मिल जाएंगे। कुछ लोग उनसे प्रभावित होकर.. उनसे जुड़ भी जाते है और अपनों को अंग्रेजी में होशियार समझने की दौड़ में शामिल हो जाते है। इन सब से हमारी आंशिक पूर्ति तो हो जाती है, लेकिन संपूर्ण पूर्ति नहीं हो पाती है, सम्पूर्ण पूर्ति के लिए या तो हम पूर्ण रूप से अंग्रेजी को जानना होता है या फिर उस माहौल में रहना होगा जहां अंग्रेजी के बिना आप का काम ही ना चल पाएं। आप को जैसी भी आती है लेकिन आपको काम अपनी टूटी-फूटी अंग्रजी से ही लेना होगा। हम भारतीय ऐसे कामों में अधिक फंसे रहते है जिनसे भविष्य में हमारा चाहे पाला न पड़े लेकिन कुछ भाषाई ज्ञान हमे ढौना ही पड़ेगा।
अधिकांशत: प्रतियोगिताओं में अंग्रेजी का पर्चा भी होता है जो शुद्ध भारतीय/ मांटी के लाल को बहुत परेशान करता है। जिसमें अच्छों-अच्छों का पसीना छूट जाता है लेकिन वहीं जब बात हिन्दी की आती है। तो हम सब एक ही सांस में कहते है, ये भी कोई पेपर है इसे पढ़ने की जरूरत नहीं, ये तो आसानी से हो जाएगा। बाद में पता चलता है कि अंग्रेजी में हाथ तंग था उनमें न. ज्यादा हैं , हिन्दी में कम नम्बर आएं है। ऐसे में हिन्दी को आसान समझकर या दोयम दर्जें का स्थान देकर हम आगे निकल जाते है लेकिन हमारी हिन्दी पीछे छूट जाती है, वर्तमान में हो भी यही रहा है। हम हिन्दी की बिन्दी तक पर ध्यान नहीं देते।
मुझे तो इंग्लिश नॉवल चाहिए। मेरी भी अलमीरा में बहुत से अंग्रेजी नॉवल है जो आज भी पुकार करते है कि उनके ऊपर लगी पेकिंग कोई तोड़े और उन्हें पढ़ ले, लेकिन कुछ हिन्दी के नॉवल आज भी कई लोगों के हाथों से होकर मट-मैले होकर एक हाथ से दूसरे हाथों तक पहुंच रहे है, लेकिन यहां पर प्रश्न यह उठता है क्या वाकै ही हिन्दी नॉवल पढ़े जा रहे है। शायद नहीं ! आज-कल युवाओं की हिन्दी पठन-पाठन की जिज्ञासा कम देखी जा रही है। हिन्दी की सामग्री इंटरनेट पर बढ़ रही है लेकिन प्रकाशन से लेकर बाजार तक हिन्दी की मांग अंग्रेजी के मुकाबले कम है।
इसमें कोई दो राय नहीं की हिन्दी को पढ़ने वाली की कमी हुई है। पढ़ने वाले मिलते है, तो लिखने बाले कम मिलते है। हम अपनी बातों को सोचते तो हिन्दी में हैं, लेकिन उसे प्रस्तुत अंग्रेजी के माध्यम से करना पसंद करते है या अंग्रेजी के ढ़ेर सारे शब्द वाक्य विन्यास के लिए शामिल कर लेते है। इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि हम अपने बच्चों को हिन्दीवादी या हिन्दी भाषी बनाना चाहते है। ऐसे बहुत ही कम लोग होंगे। सब चाहते है उनके लाड़ले/लाड़ली अंग्रेजी जरूर जाने चाहे हिन्दी ना आएं। खिटर-पिटर अंग्रेजी में ही करें, क्योंकि भारत जैसे सीमित अवसर वाले देशों में भाषाई, योग्यता, डिग्री न जाने कितनी पात्रताओं के बाद आप को किसी लायत समझा जाता है। नौकरी मिली तो आप लायक नहीं तो नाल....क। अंतिम में उसे अंग्रेजी से बड़ी लड़ाई लड़नी ही है। प्राइवेट स्कूलों की बात करें तो वहां बच्चों के हिन्दी बोलने पर शुल्क तक लगाएं जाते है। यहां पर मंशा चाहे कुछ भी हो लेकिन यह सब छोटे-छोटे कारण है जो हिन्दी को पीछे छोड़ते हैं।
हिन्दी से रोजगार की मार में वृद्धि हुई है। यदि कोई युवा अंग्रेजी जानता है और हिन्दी का जानकार नहीं है तब भी वह हिन्दी भाषी देश में हर नौकरी के लिए काबिल है, लेकिन हिन्दी जानने के बाद करोड़ो काबिल लोग, योग्यता के आधार पर मुख्य धारा से दूर कर दिये जाते है। ये कसूर किस का है नीति निर्माताओं का, हमारे परिवेश का, हमारी भाषा का या खुद हिंदी का ? जवाब कुछ भी हो मुसीबत हिंदी भाषी लोगों की ही है और हिंदी जानने की है।
हमें यह सोचना होगा कि हिन्दी को किस आधार पर ले। कहीं -कही हिन्दी न जानने पर, तो कहीं हिन्दी मात्र की अधिक जानकारी आप को ले डूब्ती है। आप को अपनी भाषा और योग्यता के पैमाने के साथ तालमेल बैठाना होगा। नहीं तो नय्या पार नहीं लग पाएंगी। हिन्दी की अपनी सीमाएं है उन्हें पहचाने और आगे बढ़ने की जरूरत है।

Monday, 9 September 2019

प्लास्टिक के अधिक प्रयोग से पनपती समस्याएं

वह दिन दूर नहीं जब हम अपने किए पर पछताएंगे और कहेंगे कि शहरों से अच्छे गांव है और गांवों से अच्छे वह सूदूर क्षेत्र जिनमें शायद जनजातियां ही रहती है। शहरीकरण और हर दिन हमारी बढ़ती मांगों और फैलती अधुनिक बाजार की संकल्पना ने इसे और अधिक घातक बनाने का काम किया है। हम न जाने चाहते और न चाहते हुए कितनी प्लास्टिक और पॉलिथिन अपने घर ले आते है हम भी पता नहीं चलता, क्योंकि हम जिंदगी की उस दौड़ में शामिल है जिसने हमारे जीवन जीने को तो सरल बनाया है लेकिन भविष्य में इसकी सूरत कितनी भयानक होगी। शायद् इसका हमें अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस शहर में हम रहते है उसमें भ्रमण करे और देखे की जो हमारे घरों से निकले वाली गंदगी है वह कहा जा रही है हम दैनिक जीवन में प्रयोग में लाने वाली चीजों के लिए कितनी प्लास्टिक और पॉलिथीन प्रयोग करते है साथ ही उस हम किस स्थान पर छोड़ते है इसका प्रभाव भी हमारे सामने है। आज शायद पृथ्वी का कोई ऐसा कौना बचा होगा जिमें पॉलीथीन या प्लास्टिक की पहुंच ना हो।
स्थिति और अधिक बदतर जब हो जाती है जब यह सुविधाओं से भरी प्लास्टिक का निस्तारण समय से और पूर्ण रूप से न कर लिया जाएं। हमारी जीविका ने प्लास्टिक के प्रयोग को इतना बढ़ा दिया है कि यदि हम आस-पास की चीजों को देखे तो बहुत सी दैनिक इस्तेमाल की वस्तुओं का निर्माण प्लास्टिक से ही हुआ है और जब हम उसमें रखी वस्तु का उपयोग कर लेते है तो उस प्लास्टिक के साथ हमारा कैसा व्यवहार होता है और उसका निस्तारण होता भी है के नहीं हम नहीं जानते।
यदि केंन्द्रिय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रतिदिन 25940 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। जिसका लगभग 40 प्रतिशत प्लास्टिक कचर फिर से इक्ट्टा नहीं हो पाता है। ऐसे में यह कचरा या तो मिट्टी के अंदर, जमीन के ऊपर या पानी में किसी न किसी रूप में कायम रहता है इसके गलने और सड़का का चक्र बहुत बड़ा होता है ऐसे में यह बचा कचरा भारत जैसे विकासशील देश के लिए बड़ी समस्यां है। इतना ही नहीं जो बड़े शहर है वहां जनसंख्या के बढ़ते घनत्व और अधिक जनसंख्या की मांग के चलते प्लास्टिक में बंद सामान ज्यादा खरीदा जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि ऐसे शहरों में कचरा उत्पन्न भी ज्यादा होता है। दिल्ली में 690 टन प्लास्टिक कचर प्रति दिन उत्पन्न होता है। देश में सबसे ज्यादा कचरा उत्पन्न महाराष्ट्र में होता है जो कि चार लाख सत्तर हजार टन के आसपास सालाना कचरा पैदा करता है। जिसका आधिकाशं हिस्सा समुद्र की सतह पर देखा जा सकता है। इसके बाद सालाना अधिक कचरा उत्पादन में गुजरात और दिल्ली का नाम आता है। बड़ी समस्यां यह नहीं है कि कचरा पैदा हो रहा बड़ी समस्यां यह है कि उस प्लास्टिक को किस-तरह से दौबारा एकत्र किया जा सके उसको पुन: किसी रूप में इस्तेमाल किया जा सके। इसके लिए न तो सरकारों के पास कोई ठोक विकल्प है और न ही दूरदर्शिता। बड़ी-बड़ी कम्पनियां अभी की प्लास्टिक के पैकेट में सामान बाजार में बैच रहे है उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है क्योंकि यह प्लास्टिक मिट्टी में तो सड़ता है और न ही घुलता है परिणाम यह होता है कि यह मिट्टी की अवशोषित करने की क्षमता को घटाता है जिससे मिट्टी जल अवशोषित नहीं कर पाती है और भू-जल की समाप्ति होनी लगती है।
भारत में 22 प्रदेश ऐसे हैं जिनमें प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई हुई है, लेकिन इनसब के बाद भी प्लास्टिक का प्रयोग रूकने का नाम नहीं ले रहा है। जिसमें सबसे बड़ी समस्यां सरकार के फैसलों को ही गलत ठहराया जा सकता है क्योंकि किसी भी कानून को बनाने से पहले यह विचार जरूर कर लेना चाहिए कि यदि प्लास्टिक बैन होता है तो जनता के पास इसका क्या विकल्प है। क्यां बाजार में विकल्प के रूप में दूसरी चीज़ उपलब्ध भी है के नहीं या स्वयं सेवकों या छोटी-2 इकाइयों को सरकारी मदद् से कुछ विकल्प तैयार कराकर बाजार में उपलब्ध कराए जा सकते है। 05 प्रदेश ऐसे भी है जहां इस बात को अधिक गंभीर न मानते हुए कोई कानून लागूं नहीं है।
सरकारों की बाकी विषयों की तरह इस पर भी गंभीरता दिखानी चाहिए ताकि हम अपने अतीत से शिक्षा लेकर भविष्य में अपनी पीढ़ी को एक सुनेहरा वातावरण देकर जाएं तो वह भी खुली हवां में सांस ले सके, साफ पानी पी सके और अपनी धरा पर गर्व करते हुए उससे प्यार करें।

Friday, 6 September 2019

प्लास्टिक प्रदूषण से बढ़ती समस्यां

वह दिन दूर नहीं जब हम अपने किए पर पछताएंगे और कहेंगे कि शहरों से अच्छे गांव है और गांवों से अच्छे वह सूदूर क्षेत्र जिनमें शायद जनजातियां ही रहती है। शहरीकरण और हर दिन हमारी बढ़ती मांगों और फैलती अधुनिक बाजार की संकल्पना ने इसे और अधिक घातक बनाने का काम किया है। हम न जाने चाहते और न चाहते हुए कितनी प्लास्टिक और पॉलिथिन अपने घर ले आते है हम भी पता नहीं चलता, क्योंकि हम जिंदगी की उस दौड़ में शामिल है जिसने हमारे जीवन जीने को तो सरल बनाया है लेकिन भविष्य में इसकी सूरत कितनी भयानक होगी। शायद् इसका हमें अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस शहर में हम रहते है उसमें भ्रमण करे और देखे की जो हमारे घरों से निकले वाली गंदगी है वह कहा जा रही है हम दैनिक जीवन में प्रयोग में लाने वाली चीजों के लिए कितनी प्लास्टिक और पॉलिथीन प्रयोग करते है साथ ही उस हम किस स्थान पर छोड़ते है इसका प्रभाव भी हमारे सामने है। आज शायद पृथ्वी का कोई ऐसा कौना बचा होगा जिमें पॉलीथीन या प्लास्टिक की पहुंच ना हो।
स्थिति और अधिक बदतर जब हो जाती है जब यह सुविधाओं से भरी प्लास्टिक का निस्तारण समय से और पूर्ण रूप से न कर लिया जाएं। हमारी जीविका ने प्लास्टिक के प्रयोग को इतना बढ़ा दिया है कि यदि हम आस-पास की चीजों को देखे तो बहुत सी दैनिक इस्तेमाल की वस्तुओं का निर्माण प्लास्टिक से ही हुआ है और जब हम उसमें रखी वस्तु का उपयोग कर लेते है तो उस प्लास्टिक के साथ हमारा कैसा व्यवहार होता है और उसका निस्तारण होता भी है के नहीं हम नहीं जानते।
यदि केंन्द्रिय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार भारत में प्रतिदिन 25940 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। जिसका लगभग 40 प्रतिशत प्लास्टिक कचर फिर से इक्ट्टा नहीं हो पाता है। ऐसे में यह कचरा या तो मिट्टी के अंदर, जमीन के ऊपर या पानी में किसी न किसी रूप में कायम रहता है इसके गलने और सड़का का चक्र बहुत बड़ा होता है ऐसे में यह बचा कचरा भारत जैसे विकासशील देश के लिए बड़ी समस्यां है। इतना ही नहीं जो बड़े शहर है वहां जनसंख्या के बढ़ते घनत्व और अधिक जनसंख्या की मांग के चलते प्लास्टिक में बंद सामान ज्यादा खरीदा जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि ऐसे शहरों में कचरा उत्पन्न भी ज्यादा होता है। दिल्ली में 690 टन प्लास्टिक कचर प्रति दिन उत्पन्न होता है। देश में सबसे ज्यादा कचरा उत्पन्न महाराष्ट्र में होता है जो कि चार लाख सत्तर हजार टन के आसपास सालाना कचरा पैदा करता है। जिसका आधिकाशं हिस्सा समुद्र की सतह पर देखा जा सकता है। इसके बाद सालाना अधिक कचरा उत्पादन में गुजरात और दिल्ली का नाम आता है। बड़ी समस्यां यह नहीं है कि कचरा पैदा हो रहा बड़ी समस्यां यह है कि उस प्लास्टिक को किस-तरह से दौबारा एकत्र किया जा सके उसको पुन: किसी रूप में इस्तेमाल किया जा सके। इसके लिए न तो सरकारों के पास कोई ठोक विकल्प है और न ही दूरदर्शिता। बड़ी-बड़ी कम्पनियां अभी की प्लास्टिक के पैकेट में सामान बाजार में बैच रहे है उन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है क्योंकि यह प्लास्टिक मिट्टी में तो सड़ता है और न ही घुलता है परिणाम यह होता है कि यह मिट्टी की अवशोषित करने की क्षमता को घटाता है जिससे मिट्टी जल अवशोषित नहीं कर पाती है और भू-जल की समाप्ति होनी लगती है।
भारत में 22 प्रदेश ऐसे हैं जिनमें प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई हुई है, लेकिन इनसब के बाद भी प्लास्टिक का प्रयोग रूकने का नाम नहीं ले रहा है। जिसमें सबसे बड़ी समस्यां सरकार के फैसलों को ही गलत ठहराया जा सकता है क्योंकि किसी भी कानून को बनाने से पहले यह विचार जरूर कर लेना चाहिए कि यदि प्लास्टिक बैन होता है तो जनता के पास इसका क्या विकल्प है। क्यां बाजार में विकल्प के रूप में दूसरी चीज़ उपलब्ध भी है के नहीं या स्वयं सेवकों या छोटी-2 इकाइयों को सरकारी मदद् से कुछ विकल्प तैयार कराकर बाजार में उपलब्ध कराए जा सकते है। 05 प्रदेश ऐसे भी है जहां इस बात को अधिक गंभीर न मानते हुए कोई कानून लागूं नहीं है।
सरकारों की बाकी विषयों की तरह इस पर भी गंभीरता दिखानी चाहिए ताकि हम अपने अतीत से शिक्षा लेकर भविष्य में अपनी पीढ़ी को एक सुनेहरा वातावरण देकर जाएं तो वह भी खुली हवां में सांस ले सके, साफ पानी पी सके और अपनी धरा पर गर्व करते हुए उससे प्यार करें।

पुरानी आस्थाएं, आज का प्रदूषण

जो पहले नल था अब वह स्वतं चालित जनकूप है, जो पहले नाली थी अब वह नाला है, जो पहले नहर थी अब वह नाला है।  जो आज नदियां है वह प्रदूषित सूखी झील है,  जिनमें यदा कदा पानी आता है और जहां जहां बचा रह कर या नदियों से प्रदूषित जल यहा 

Sunday, 1 September 2019

नागरिकों पर वार, नियमों की कतार

आज यानि सितम्बर 2019 की पहली तारीख से भारत सरकार ने यातायात नियमों में बहुत से बदलाव किए है या यू कहे कि बदलाव नहीं सिर्फ यातायात के नियमों का उल्लंघन या नियम तोड़ने पर आपको पहले से लग रहे जुर्माने के 10 गुना तक वसूली की जाएंगी। बाकी सरकारी व्यवस्थाएं वैसी की वैसी जैसे पहले थी पुलिस पुरानी, सड़के पुरानी, व्यवस्था पुरानी, काम-काज का तरीका पुराना, सुविधाएं पुरानी, सड़को की गुणवत्ता और मानक पुराने बस बढ़ाई गई है तो कानून तोड़ने के नाम पर कानून न कह कर इसे वसूली कहना सही रहेगा। इतिहास गवाह रहा है कि भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश में जब कुछ नया करने जा रहे होते है तो बेकसू लोगों को अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसका हालिया उदाहरण नोट बंदी से लिया जा सकता है। सरकारों या निति बनाने वाले को पता होना चाहिए कि जिस देश में 30-35 प्रतिशत जनसंख्या केवल खाने के लिए रात-दिन एक कर देती है। जिस देश में करोड़ों की संख्या में देश के बच्चे का शिकार हो। जिस देश में हर गली महिल्ले में तंबाकू और शराब की दुकान सिर्फ लोगों की बुद्धि खराब करने के लिए उपलब्ध हो, जो करोड़ों घरों की दैनिक समस्यां हो। ऐसे में कानून उन सब समस्याओं पर बनाने की जरूरत है। जहां हर मिनट बलात्कार जैसी घिनौनी हरकत होती हो, उन पर कानून बनाने की जरूरत है। जो लाखों मुकदमें जजों की कमी से रूके पड़े है उन पर कड़े कानून की आवश्यकता है। किसान की गरीबी, देश में प्रदूषित होता पानी, भष्टाचार, तेजी से बढ़ती शहरी गंदगी जैसे बड़े मु्ददे जीवन में रूकावट पैदा कर रहे है उन सब को नजर अंदाज कर हम ज्यादा दिनों तक आंख नहीं मूद सकते। 
सरकारों को कानून बनाने का अधिकार है, उन्हें जनहित में लागू करने का जिम्मा भी उन्हीं का है, लेकिन सरकारों को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि जिस देश के नागरिकों के लिए यह कानून बनाएं जा रहे है क्या वहां का नागरिक उन कानूनों को वहन करने के लिए तैयार भी है के नहीं। जिस देश में लगभग 45 प्रतिशत जनसंख्या की आमदनी 12 हजार रूपयों से भी कम हो, ऐसे में मोटर वाहन का प्रदूषण फैलाने पर 10,000  रुपये का जुर्माना कैसे संभव है और मान भी लें कि संभव है उसकी आड़ में जो एक प्रदूषण संबंधि प्रमाण पत्र दिया जाता है वह मात्र कागज है सभी के वाहन उसके मुताबित सही है। सरकारें ऐसे काम काज को कैसे मूक-बधिर बने कैसे देख सकती हैं हम सब जानते है कि जो प्रदूषण प्रमाण पत्र देते है वह किसी मानक या किसी तकनीकि का प्रयोग नहीं करते बस फोटो खीचते है और कागज़ का टुकड़ा पकड़ देते है। 
कोई भी तंत्र ऐसा नहीं हो सकता कि उसे अपनी जनता की जानकारी ना हो और यदि ऐसा है तो पहले वह जनता को जाने फिर उसके लिए कानून तैयार करें। जनता जब रोटी के लिए जुगत कर रही हो ऐसे में उससे बड़े दण्ड की भरपाई करपाना संभव नहीं है और यदी वह किसी प्रकार दण्ड की भरपाई कर भी देता है  तो ऐसे में उसके परिवार की जीविका का क्या होगा उस पर भी कानून बनाने से पहले विचार करने की आवश्यकता है। कानून बने, लेकिन उन सब के विरूद्ध जो परम आवश्यक मुद्दे है जैसे नशे में गाड़ी चलाना, धूम्रपान करते हुए गाड़ी चलाना, मोबाइल पर बाते करना, हेल्मेट न लगाना, तेज रफ्तार में गाड़ी चलाना, ओवर-लोडिग आदि ऐसे नियम हो सकते है जो कड़ाई से पालन कराने की आवश्यकता है। 
सवाल यह भी उठता है कि जब कानून बनाने वाले और रखवाले ही स्वयं कानून तोड़ेंगे तो उन पर सामान्य नागरिक से दो गुना जुर्माना वसूला जाना चाहिए, क्योंकि वही देश को उदाहरण प्रस्तुत करते है। किसी नेता और पुलिस की गाड़ी के लिए नियम अलग नहीं हो सकते । यदि रिसर्च पर गौर करेंगे तो पाएंगे अधिकांशत सरकारी तंत्र की सुविधाएं ही अधिक खराब स्थिति में हैं, अधिकांश लोकल बस और किसी-किसी रोडवेज बस की स्थिति इतनी दयनीय होती है कि बैठने लायक नहीं होती दूसरा उसमें ओवर लोडिंग का तो मुद्दा आम है। ऐसे में हमें स्वयं में स्थिति की खमियाओं को खोजने की आवश्यकता है, जनता का क्यां है बेचारी थी और बेचारी रहेगी।

Saturday, 10 August 2019

पर्यावरण की कोख, गोद और आवरण को हम गटर बना रहे

हम मानव जाति बड़े ही कमाल के व्यक्ति है। हम सबसे ज्यादा समझदार, पढ़े-लिखे, सभ्य, प्रगतिशील और उन्नति की ओर बढ़ते हुए दूरदर्शी व्यक्ति समझे जाने वाले इस सम्पूर्ण धरा पर एकलौते जीव है। हम इतने समझदार माने और समझे जाते है कि हम न केवल अपने गृह धरती की भौगोलिक स्थिति ही नहीं बल्कि दूसरों गृहों पर भी जीवन खोजने की जुगत में है ताकि भविष्य के लिए नई उम्मीदें और संभावनाएं तलाशी जा सके। आए दिन कई करोड़ों खर्च की नई खोजे, नई तकनीकि के पीछे पूरे विश्व के भिन्न-2 देश करोड़ो-अरबों पैसे लगा रहे है, ताकि वह तकनीकि में दूसरे देशों को पिछाड़ सके। इसी क्रम में हम न केवल प्राकृतिक बल्कि कई अरबों टन अप्राकृतिक मल पीछे छोड़ रहे है जिसकी कई देशे ने अच्छी पहल की है, लेकिन अधिकांश विकासशील देश इस क्रम में अपने को पंक्ति में कही बहुत पीछे खड़ा हुआ पा रहे है। जहां एक ओर विकसित तकनीकि न होने के कारण, दूसरा देश की अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नहीं कि वह ऐसे कार्य पर पैसा लगा सके।
ताज के पास बहती यमुना नदी में पड़ा कूड़ा, फोटो -गूगल/NICKGARBUTT.COM





















































 
  
भारत जैसे विकासशील देश, अपनी अर्थव्यस्था की दौड़ में तेजी से वैश्विक स्तर पर बढ़ता देश, सरकारी आकड़ों में विश्व में परचम लहराने को तत्पर देश व समुचित विकास की ओर तीर्व गति से बढ़ता देश उन छोटी-छोटी बुनियादी चीजों के लिए भी जुगत करना देखा जा सकता है, विकास के पैमानों की धुरी साबित होता है। यहां बड़े और छोटे शहरों के छोड़ की समस्याओं को यदि हम छोड़ भी दे तो जो शहरी समस्याएं पहले शहरों में हुआ करती थी अब वह दूर दराज के गांवों में भी पनपने लगी है। हवा, पानी और धरा तीनों को प्राकृतिक रूप से लूटते सरकारी व गैर सरकारी संगठन भविष्य की संचय नीधि से अवगत होते हुए भी, धरती की जीवन लीला को इस तरह से घेर रहे है जिसके भयंकर परिणाम आने संभव है। गांव का पानी का जलस्तर गिर रहा है, वहा जो गंदगी पहले ना के बराबर हुआ करती थी, अब शहर का मल दूरदराज के गांवों के आसपास फैका जा रहा है, गांव में सरकारों की मदद से शौचालय बन गए लेकिन उस शोच की निकासी की व्यस्था नहीं है, शहर की फैक्ट्रियों को आस-पास के गांवों में लगा दिया है। ऐसे में जल स्तर तो घटा ही है, साथ ही पानी की गुणवत्ता भी खराब हुई है। सरकारें लोगों से अपील करती है कि व्यवस्थाओँ को दुरूस्त करने के अनेकों ऊपाएं हैं लेकिन जब जनता के पास उसे दुरूस्त करने का जरिया ही नहीं, तो मजबूर व्यक्ति सरकार की ओर ताकता रहता है। आज भी सरकारें जल, हवा और धरा के लिए सजग तो है लेकिन काम काज को लेकर उनकी नीयत स्पष्ट नहीं है। कई सालों से पॉली बैग को बंद करा चुकी सरकारी आज भी उसे बंद नहीं करा पाई है। जब सरकारें जनता से टेक्स जमा करा सकती है तो ऐसे में नियमों को क्यों तार पर रखा जा रहा है। सब कुछ जनता के हवाले करने से काम नहीं चलता है। सरकारों के अपनी जरूरत के हिसाब से नहीं पर्यावरण की सेहत को ध्यान में रखते हुए कदम उठाने होंगे ताकि धरा की सेहत को दुहरूत किया जा सके।

अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष - 2023

भारत गावों का, किसान का देश है। भारत जब आज़ाद हुआ तो वह खण्ड-2 था, बहुत सी रियासतें, रजवाड़े देश के अलग-अलग भू-खण्डों पर अपना वर्चस्व जमाएं ...