यह ब्लॉग एक विचारधारा है। जिसमें लेखक की अनुभूति है, विचार है, भावनाएं हैं, संवेदनाएं हैं और अधिकारों को सचेत करने की आशा है।
Monday, 4 February 2013
सूचना के अधिकार का सच
चंद दिनों पहले ‘सूचना का अधिकार’ अधिनियम की सातवीं वर्षगाँठ मनाई गई।
साथ ही यह भी उजागर हो पाया कि दुनिया के इस विशालकाय लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को रोकने
और समाप्त करने की दिशा में एक अति महत्वाकांछी कानून अपने उद्धेश्यों को पूरा करने में कहां तक सिद्ध
हो सका है ? यदि हम इस अधिकार की प्रतिष्ठा और
प्रभावोत्पादकता को और ओजस्वी बनाना चाहते है तो सूचना का अधिकार अधिनियम कानून
अपनी कसौटी पर कितना खरा उतर पाया है इसका आँकलन करना अब अनिवार्य हो गया है। एक
बड़ा प्रश्न यह भी है कि हमें इस कानून को किस दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं।
भारत सरकार द्वारा नागरिकों हेतु, लोक सेवकों के कार्य में पारदर्शिता एवं जवाबदेही को प्रोत्साहित करने के
लिये ''सूचना का अधिकार अधिनियम 2005'' का कानून बनाया गया। इसके अंतर्गत कोई भी नागरिक लोक सेवक के अधीन उपलब्ध
जानकारी देख या प्राप्त कर सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि
सूचना का अधिकार अधिनियम भारत सरकार द्वारा बनाया गया एक
सशक्त कानून है, जहाँ एक ओर यह कानून हर भारतीय नागरिक को, किसी भी सरकारी संस्था से
प्रत्यक्ष रूप से सूचना प्राप्त करने का अधिकार देता है वहीँ दूसरी ओर यह कानून
सरकारी अधिकारियों को जवाबदेही के लिए भी मजबूर करता है। इसमें लोक सेवक के
द्वारा रोके गये अथवा उनके अधीन किसी भी जानकारी को प्राप्त करने का हक सूचना का
अधिकार प्रदान करता है। जिसमें कार्य का निरीक्षण, दस्तावेज, अभिलेख नोट्स/निष्कर्ष अथवा दस्तावेजों/अभिलेखों की प्रमाणित प्रति प्राप्त
करना प्रमाणित सामग्री का नमूना प्राप्त करना शामिल हैं। कोई भी नागरिक हिन्दी,अंग्रेजी
तथा स्थानीय भाषा में निर्धारित शुल्क के साथ लिखित आवेदन देकर आवश्यक जानकारी प्राप्त
कर सकता है। प्रत्येक लोक प्रशासन विभाग विभिन्न स्तरों पर एक केन्द्रीय सहायक लोक
सूचना अधिकारी पदस्थ हैं जो नागरिकों को सूचना प्रदान करने के लिये आवेदन स्वीकार
करते हैं। सभी प्रशासकीय इकाई/कार्यालय के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी नागरिकों को
आवश्यक सूचना प्रदान करने की व्यवस्था करते हैं। सूचना के लिये प्राप्त आवेदनों को
30 दिन के अंदर सूचना देकर अथवा अनुरोध
अस्वीकार कर देना आवश्यक है।
इस कानून का उद्देश्य नागरिकों को
अधिकार संपन्न बनाना, सरकार की कार्य प्रणाली में
पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार को
कम करना तथा लोकतंत्र को सही अर्थों में लोगों के हित में काम करने में सक्षम
बनाना है। इस अधिनियम ने एक ऐसी शासन प्रणाली सृजित की है जिसके माध्यम से
नागरिकों को लोक प्राधिकारियों के नियंत्रण में उपलब्ध सूचना तक पहुंचना सहज हुआ है,
लेकिन इसकी कार्यप्रणाली पर अभी भी एक बड़ा प्रश्नवाचक चिह्न अंकित है जो कि कुछ
विशेषज्ञयों के गले नहीं उतरता। क्योंकि यह लोगों को कोई नया अधिकार
नहीं देता, यह केवल उस प्रक्रिया का उल्लेख करता है कि हम कैसे सूचना मांगें, कहाँ से मांगे, कितना
शुल्क दें आदि। इस सूचना के अधिकार को 9 राज्य सरकारें पहले ही राज्य कानून पारित
कर चुके है। जिनमें जम्मू कश्मीर, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य
प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा और असम शामिल हैं । आरटीआइ प्रत्येक
नागरिक को शक्ति प्रदान करता है कि वें सरकार से कुछ भी पूछे या कोई भी सूचना मांग
सकते हैं, किसी भी सरकारी निर्णय की प्रति ले सकते हैं।किसी भी सरकारी दस्तावेज या
कार्य का निरीक्षण कर सकते है, किसी भी सरकारी कार्य के पदार्थों के नमूने प्राप्त
कर सकते हैं। मात्र 11 विषयों को छोड़कर। फिर भी न जाने क्यों सरकारें इस कानून से
डरतीं हैं कि इस कानून के बन जाने के बाद सूचना मांगने वाले आवेदनों की बाढ लग
जाएगी और कार्यप्रणाली ढप हो जाएगी। 65 से अधिक देशों में कानून लागू है। इन सभी में आरटीआइ अर्जिया
सीमित ही रही कारण चाहे जो भी हो। सरकारी तंत्र को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अर्ज़ी डालने में समय, मेहनत व संसाधन लगते हैं जो कि उद्देश्य को
ध्यान में रखते हुए जनता सूचना चाहती है। यदि आवेदन की बात की जाए तो पता चलता है
कि दिल्ली में 60
से अधिक महीनों में 120 विभागों में 14000 अर्जियां दाखिल हुईं। यानि 2 से कम
अर्जियां प्रति विभाग प्रति माह। क्या हम कह सकते हैं कि दिल्ली सरकार में आरटीआइ
अर्जियों की बाढ़ आ गई? यूएस सरकार को 2003-04 के दौरान
अधिनियम के तहत 3.2 मिलियन अर्जियां प्राप्त हुईं। यह उस तथ्य के बावजूद है कि
भारत से उलट, यूएस सरकार की अधिकतर सूचनाएं नेट पर
उपलब्ध हैं और लोगों को अर्जियां दाखिल करने की कम आवश्यकता होनी चाहिए। लेकिन ऐसे
में यूएस सरकार अधिनियम को समाप्त करने का विचार नहीं कर रही है। इसके उलट वे
अधिकाधिक संसाधनों को इसे लागू करने में जुटा रहे हैं। जिसके लिए गत वर्ष, 32 मिलियन यूएस डॉलर इसके क्रियान्वयन में खर्च
किए गए। लेकिन भारत जैसे देश में आरटीआइ अधिनियम के क्रियान्वयन में खर्च किये गए
संसाधन क्या सही खर्च होंगे?
यूएस जैसे अधिकांश देशों ने यह पाया है कि वे अपनी सरकारों को पारदर्शी बनाने पर
अत्यधिक संसाधन खर्च कर रहे हैं। लेकिन वहां पर खर्च लागत उसी वर्ष पुनः उस धन से प्राप्त
हो जाती है जो सरकार भ्रष्टाचार व गलत कार्यों में से कमा लेती है।
एक जनहित
याचिका को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट (भारत सरकार की सुप्रिमो न्यायपालिका) की
खंडपीठ ने सूचना के अधिकार के संदर्भ में गत 13 सितंबर को एक ऐसा फैसला सुनाया, जिस पर देश के
बौद्धिक क्षेत्रों में बड़ी बहस छिड़ गई। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि केंद्र और
राज्यों में जो सूचना आयोग है, वे न्यायिक और प्राय: न्यायिक कार्य करते हैं। उनकी
संरचना भी अदालतों जैसी है, इसलिए इनमें उन व्यक्तियों की
नियुक्ति होनी चाहिए, जिनकी पृष्ठभूमि कानून से संबंधित हो। इस
फैसले पर आरटीआइ कार्यकर्ता आश्चर्य और असमंजस में हैं। उन्हें इस बात का विश्वास है
कि यदि इस तरह का कुछ नया संशोधन किया गया तो दैनिक मामलों के निपटारे में देरी
होने लगेगी। खासकर अगर सूचना आयुक्तों की संख्या में इजाफा न किया गया तो समस्या
गंभीर हो सकती है। गौरतलब है कि सीआइसी को प्रत्येक माह लगभग 2500 शिकायतें और अपीलें मिलती हैं, जिनमें से तकरीबन1900
का निपटारा समय पर कर दिया जाता है। लेकिन इस तरह लगभग 600 मामले लंबित रह जाते हैं। यह स्थिति अकेले सीआइसी की है और अगर इसमें
राज्यों के लंबित मामलों को भी जोड़ लिया जाए तो हजारों मामले हर माह लंबित हो
जाते हैं। जाहिर है, ऐसे में केंद्र व राज्यों के स्तर पर
अतिरिक्त आयुक्तों की परम आवश्यकता है। वर्तमान में आयुक्त जो भी हैं उन्में कुछ
सूचना आयुक्त ऐसे नियुक्त हो गए हैं, जो अपने काम को अच्छी
तरह से नहीं जानते। यहां पर उनकी योग्यता पर मेरा प्रश्चवाचन नहीं है। कई मामलों
में देखा गया है कि अपने अधिकार क्षेत्र के मुद्दों को भी वें नहीं निपटा पाते,
क्योंकि उनके पास कानून के प्रावधानों की व्याख्या करने का पर्याप्त
अनुभव नहीं है। लेकिन यह समस्या इस वजह से नहीं है कि फिलहाल सूचना आयोग में
रिटायर्ड न्यायाधीश नहीं बैठे हैं। बल्कि इस वजह से है कि सूचना आयुक्त नियुक्त
करने के नियम को बहुत अधिक खुला और विस्तृत रखा गया है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट
का फैसला था कि नियुक्ति कानून, विज्ञान, समाजसेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता
आदि में अनुभवी लोगों की नियुक्ति की जा सकती है। ऐसे में जरूरत आरटीआइ के
नियुक्ति नियम में संशोधन और स्पष्टता की है, न की आयोग में
रिटायर्ड न्यायाधीशों की।
शैलेष गांधी (पूर्व सूचना आयुक्त) का कहना है कि सूचना का अधिकार लगभग सभी शक्तिशाली लोगों को चुनौती देता
है। इसलिए इसके सामने कुछ गंभीर खतरे हैं। इनमें सबसे बड़ा खतरा सूचना आयोगों से
ही है। इसकी बड़ी वजह यह है कि सात साल पुराने इस कानून के कई मामले सूचना आयोगों
में दो-तीन सालों से लंबित पड़े हैं। यदि यही सिलसिला जारी रहा तो अगले पांच
वर्षों में इस तरह के लंबित मामलों की अवधि तीन से पांच साल हो जाएगी। ऐसे में आम
आदमी का इससे मोहभंग हो जाएगा और आमजन इससे दूर हो जाएंगे। एक और बड़ा खतरा
न्यायिक प्रणाली है। कई महत्वपूर्ण आदेशों पर स्टे हो जाता है।
जिस तरह से अदालतें काम करती हैं उससे एक मामला पांच से दस साल तक लटक जाता है। शक्तिशाली सरकारी महकमे और सत्ताधारी
लोग इसी तरह अपने मामलों के निर्णयों पर स्टे लेते रहे तो इससे आरटीआइ पर खतरा
स्वाभाविक है।
अरुणा रॉय
(सामाजिक कार्यकर्ता) कहती है कि देश को आजादी
मिलने के बाद अब तक सूचना का अधिकार कानून ही ऐसा हथियार है जिसने आम नागरिक को यह
अधिकार दिया कि वह प्रशासन में अपनी संप्रभुता के उपयोग और दुरुपयोग पर नैतिक रूप से
सवाल खड़ा कर सके। वोट करने का अधिकार जरूरी था, लेकिन सरकार की जवाबदेही की मांग के लिए पर्याप्त नहीं था। सूचना के
अधिकार से इस पूरी प्रक्रिया को एक कदम और आगे ले जाया गया। इसने सरकार और नागरिक
के बीच के रिश्ते की व्यापक व्याख्या की। इस कानून का सबसे यादगार आयाम यह है कि
इसे सभी वर्गों, जातियों और क्षेत्रों द्वारा इस्तेमाल किया
जाता है। बिना किसी भेदभाव के सभी लोग सूचनाएं मांग कर पंचायत से पार्लियामेंट तक
प्रगतिशील तरीके से सरकारी जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। हालांकि इन दिनों यह
कानून कई चुनौतियों से जूझ रहा है। इनमें आयुक्तों की नियुक्ति, आयोग और अपीलीय अधिकारियों के पास लंबित मामले, संशोधनों
के माध्यम से इस कानून को कमजोर करने के लगातार किए जा रहे सरकारी प्रयास और
सीबीआइ जैसे संगठनों का इस कानून के दायरे से बाहर रखने जैसे प्रावधान शामिल हैं। आजकल
सूचना के अधिकार मांगने वाले और कार्यकर्ताओं के सामने एक बड़ी चुनौती उनकी जान-माल
को खतरे को लेकरा भी है। अराजक तत्व और माफिया द्वारा ऐसे कई सूचना के सिपाही मारे
जा चुके हैं। नेशनल कंपेन ऑफ पीपुल्स राइट्स टू इंफार्मेशन के अनुसार पिछले दो साल
के अंदर करीब 150 आरटीआइ कार्यकर्ताओं पर हमले किए जा चुके
हैं। सरकार द्वारा शीघ्र ही इन लोगों की सुरक्षा का प्रबंध किया जाना चाहिए।
आरटीआइ कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वें सामूहिक रूप से खुद के एक सुरक्षा तंत्र के
तहत काम करें और उन लोगों की सुरक्षा करें जो अपने हितों की रक्षा के लिए ताकतवर
मुहिम चला रहे हैं। इनकी सुरक्षा के लिए शीघ्र ही व्हिसल ब्लोअर विधेयक पारित किया
जाना चाहिए।
आरटीआइ के
इस्तेमाल से सरकार की कार्यप्रणाली जगजाहिर हो चुकी है। योजना आयोग में शौचालय
मामले से लेकर खाद्यान्नों के जरूरतमंदों तक सरकार की कलई खोलने में यह सहायक
सिद्ध हुआ है। पूरे देश में यह कानून न्याय मांगने का एक हथियार साबित हुआ है। कई हाई कोर्ट और सक्षम अथॉरिटी के बाद अब छत्तीसगढ़
विधानसभा भी आरटीआइ एक्ट की धारा 27 और 28 द्वारा दी गई शक्तियों का दुरुपयोग किया। इन धाराओं में राज्य सरकार या
सक्षम प्राधिकारी को अपने नियम बनाने की शक्ति दी गई है। इसका उपयोग करके ही
छत्तीसगढ़ विधानसभा ने आरटीआइ की फीस 10 रुपये से बढ़ाकर 500
रुपये कर दी है। इसी तरह प्रति पेज कॉपी कराने की दर दो रुपये से
बढ़ाकर 15 रुपये कर दी गई। ऐसे में रोटी के लिए संघर्ष करता
आमजन को इस लड़ाई में दूर खड़ा करने का यह फैसला सूचना मांगेवालों को भिन्न लाईन
में खड़ा कर देने के लिए बाध्य कर देता है कि पहले आप आर्थिक रूप से सम्पन्न हो
बाद में सूचना मांगे। फिर भी कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने 26 अप्रैल 2011 में एक सर्कुलर जारी कर सभी राज्यों से आग्रह
किया कि 10 रुपये की आरटीआइ फीस के मामले में सभी समानता
रखें।
एक गंभीर
समस्या यह भी है कि सरकारी विभाग आरटीआइ को दोयम दर्जे पर रखते हुए जनसूचना
अधिकारी के पद पर विभाग के प्रमुख अधिकारी के बजाय ज्यादातर क्लर्क स्तर के कर्मचारी
को बैठाते है। जिनके द्वारा वांछित सूचनाएं न दे पाने पर अपीलों की संख्या में
लगातार बढ़ोतरी हो रही है। क्लर्क स्तर के ये कर्मचारी अपीलीय अधिकारियों के आदेश
भी नजरअंदाज करते हैं। सूचना आयोग के पास शिकायतें बढ़ने का यह भी एक बड़ा कारण
है। अपीलीय अधिकारियों को सिर्फ सुनवाई का अधिकार है, किसी जन सूचना अधिकारी पर जुर्माना या उसे सजा देने का
नहीं।
सूचना का
अधिकार केवल सार्वजनिक जीवन से जुडे़ आर्थिक, प्रशासनिक
एवं संवैधानिक तथ्यों को उजागर करने का ही औजार नहीं है, बल्कि
यह जनप्रतिनिधियों को मिले जनादेश के सही क्रियांयन को विनियमित करने की संवैधानिक
संकल्पना भी है। सीडब्ल्यूजी घोटाले में सुरेश कलमाडी, 2जी
स्पेक्ट्रम घोटाले में ए.राजा, गृहमंत्री चिदंबरम और प्रधानमंत्री कार्यालय तक की
भूमिका को विवादों में ले आने वाला वित्त मंत्रालय का पत्र इसी सूचना अधिकार
अधिनियम के कारण सार्वजनिक हो सका। हाल में उनके कई मंत्रियों द्वारा स्वेच्छा से
सार्वजनिक किया गया संपत्ति का ब्योरा भी इसी की एक कड़ी के रूप में देखा जाना
चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि इस प्रकार के बदलाव क्या इस
कानून को मजबूत बना पाएंगे? सरकार द्वारा लगातार सूचना के अधिकार कानून पर
नए सिरे से बहस की जरूरत पर बल देते रहना और रह-रहकर संशोधन की इच्छा को जाहिर
करना कांग्रेस और संप्रग की सूचना कानून से पैदा परेशानियों को ही रेखांकित करता
है। अब सवाल यह है कि इस कानून में संशोधन क्या कानून को अधिक सशक्त और पारदर्शी
बनाने के लिए है या इसकी धार को कुंद करने के लिए ? इसके
अलावा एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि आरटीआइ कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार सूचना
कानून में व्याप्त खामियों को दूर करने के प्रावधानों की मांग करते रहे हैं। सूचना
अधिकार अधिनियम में सूचना उपलब्ध कराने की समय-सीमा 30 दिन
काफी ज्यादा है, वहीं ब्रिटिश स्वतंत्रता कानून में यह
समय-सीमा महज 20 दिन ही है। चूंकि नौकरशाही की मंशा विभागीय
सूचनाओं को किसी के साथ साझा नहीं करने की रहती है, इसीलिए 30
दिन में भी वह गलत जवाब देकर आवेदक को अपील की एक लंबी प्रक्रिया
में उलझाने की कोशिश में रहते हैं। अपील और द्वितीय अपील की इस प्रक्रिया में
कभी-कभी एक साल या उससे भी अधिक का समय लग जाता है। फिर सूचना अधिकारी के दोषी पाए
जाने पर उस पर लगने वाला आर्थिक दंड भी काफी कम है, जिस कारण
कई अधिकारी इस कोशिश में भी रहते हैं कि सूचना की अपेक्षा आर्थिक दंड ही दे दिया
जाए। सामान्य नागरिक अक्सर इस लंबी प्रक्रिया से थककर सूचना प्राप्ति के अपने
अभियान को बीच में ही छोड़ देते हैं।
सूचना
अधिकार अधिनियम को अधिक सशक्त बनाने के लिए सबसे जरूरी है कि सूचना उपलब्ध कराने
की समय-सीमा को कम किया जाए। साथ ही अपील की प्रक्रिया को सरल और कम समय लेने वाला
बनाते हुए दंड के प्रावधान को सख्त करते हुए सूचना अधिकारियों के लिए सूचना उपलब्ध
कराने की बाध्यता भी निर्धारित की जाए। इसके अलावा सूचना आवेदक की सुरक्षा का सवाल
और प्राप्त सूचना से सामने आने वाली अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को दंडित करने की
व्यवस्था का आभाव भी इस मजबूत कानून की धार को कमजोर करता है। सूचना अधिकार कानून
लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने में अहम भूमिका अदा कर सकता है। बशर्ते
सूचना आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर इसे स्वायत्त संस्था का रूप दिया जाए और कानून
में ऐसे सुधार किए जाएं, जिससे प्रशासनिक निर्णयों की
सूचना सुगमता से आम आदमी की पहुंच में हो सके। सूचना अधिकार कानून के माध्यम से
सरकार के कामकाज में आने वाली पारदर्शिता को सरकार या उच्चाधिकारियों के काम में
हस्तक्षेप नहीं, बल्कि मजबूत होते लोकतंत्र और लोकतंत्र की
मजबूती में आम आदमी की भूमिका के रूप में देखा जाना चाहिए। साथ ही जन-जन तक इस
अधिकार को ले जाने के लिए इस कानून को और अधिक सरल, सुगम और त्वरिक बनाने की
आवश्यकता है।
- सुरेंद्र कुमार अधाना
Monday, 3 December 2012
तरुणाई के सपने...
प्रसिद्ध कवि पॉश ने कहा था कि ‘सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना’। प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी कहती हैं- ‘सपने देखना मौलिक अधिकार होना चाहिए’। सपने जीवित रहने चाहिए । सपनों की सांसो में ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति का संचार होते
रहना चाहिए। सपनों को महनत की जरूरत होती है। कुछ सपने बिना मेहनत के भी इंजॉय किए
जाते है। लेकिन सपनों को बिना महनत इंजॉय करना भी सभी के बस की बात नहीं। इन पर
किसी का ज़ोर नहीं, ये कब आते है कब जाते है किसी को कानों कान ख़बर नहीं देते।
खोजी पत्रकारिता भी इन्हें
छूने की जुगत तक नहीं कर पाती है। सपना देखना पर भी कॉपी राइट होना चाहिए ताकि कोई
किसी का सपना न चुरा सके। सपने देखना मौलिक अधिकार होना चाहिए ताकि सभी को सपने
देखने का समान अवसर मिल सके। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने सपनों के संदर्भ में कहा है
कि सपने वह नहीं जो सोते वक्त देखे जाए, सपने तो वह है जो सोने ना दे। हम भी
इन्हीं सपनों की बात कर रहे है। समाज में हर वर्ग का, व्यक्ति विशेष का अपना सपना
होता है। जिसे वह पाना चाहता है। जीना चाहता है। इंजॉय करना चाहता है। लेकिन सपनों
की दुनिया से दूर होता युवा अपने को वर्तमान समय में अलग- थलग पा रहा है। जीवन की
गुत्थी जटिल होती सी दिखाई दे रही है।
वर्तमान परिपेक्ष्य में सबसे
बड़ा दुर्भाग्य यह है कि युवा सपने ज्यादा देखता है, उन पर अमल नहीं करना चाहता,
सपनों को साकार तो करना चाहता है लेकिन परिश्रम नहीं करना चाहता। सपनों में वह खुद
महरूम होना चाहता है, मेहनत किराए पर या किस्तों पर करना चाहता है। युवा सपने
साकार करने में नाकाम हो रहा है। क्यूं हो रहा है यह बड़ा सवाल है ? हर बार महनत करने के लिए एक शुभ मुहुर्त की आवश्यकता महसूस
करता युवा मंजिल/ सपनो की दुनिया से कैसे दूर
हो जाता स्वयं वह खुद भी नहीं जानता है।
अब सपने देखने की सुविधाएं
बढ़ गई है। सपने हाई-टेक हो गए हैं। धरातल से युवाओं का संबंध कोसो दूर है। जिसकी
हकीकत बनने और बनाने के लिए एक लम्बी प्लानिंग की जरूरत महसूस की जाने लगी है। संकल्प
शक्ति की जरूरत होती है। समय प्रतिस्पर्धी है। शॉट-कट के इस जमाने में प्लानिंग भी
मोबाइल, लेपटॉप और आइपॉड पर अपडेट हो रही है। जैसे आज गणित की गुत्थियों को हल कर युवाओं
ने मोबाइल को जेब में रख लिया है। कुछ युवा सुविधाओं का लाभ पा हजारों-लाखों
प्रतियोगियों को दिन-प्रतिदिन पीछे छोड़ते हुए बहुत दूर निकल गए है। उनकी उम्मीदें,
इच्छाएं भी असीमित है। जो न तो इंग्ति की जा सकती है और न ही व्यक्त।
आज सुविधाएं मुट्ठी में है।
ऐसे में युवाओं को सुविधाओं से दूर कैसे रखा जा सकता है। लोगों की मुट्ठी में
दुनिया को देने का सपना उद्योग बन चुका है। यह वैश्विक कारोबार बन चुका है। सपनों
का विकेंद्रीकरण हो चुका है। आज सब कुछ सबका है। युवा विचार, युवा सपने नारा बन
चुके है। एक दूसरे से आगो निकलने की होड में रोजाना कुछ नया घटित हो रहा है।
घटनाएं तकनीक बन चुकी है। और तकनीक घटनाओं में रूपांतरित हो रही है। पूंजीवाद के
इस दौर में सब अपने-अपने जुगत में लगे है लोगों की जिंदगी को इंजॉय करने के हजारों
विकल्प बाजार सुझा रहा है। लोगों को इंजॉय कराने के लिए बिग टीवी, टाटा स्काई लाईफ
को झिंगालाला बनाने में लगे हैं। जो युवा इस बाजारीकरण का हिस्सा है। उनके सपने
सजोने और बुनने में यह भी कही हद तक सहयोग देने में सफल साबित हो रहे हैं।
तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था
में युवाशक्ति का बड़ा योगदान है जो कि किसी भी देश की सबसे बड़ी सम्पत्ति मानी जाती
है। भारत में युवाओं का प्रतिशत भारतीय जनसंख्या में सबसे ज्यादा है। कहा जाता है
कि किसी भी देश की तस्वीर बदलने में युवाओं का अहम योगदान होता है। वरन भारत में
भी यह स्थिति अपने चरम पर है जहां युवा अपने मनोबल से दुनिया जीतने के जुगत में हैं।
प्रतिभा दिखाने के हजारों
मंच युवाओं का इंतजार कर रहे हैं। हजारों युवा अपने नाम की डंका बजा मां-बाप की
तपस्या का उदाहरण बन रहे हैं। करियर, उम्मीदें, सपने और शिखर युवाओं के लिए अहम
हैं। अनेकों ऐसे युवा हैं जो करियर के शिखर पर पहुंच कर भी समाज, देश, सरोकार और
मानवता के लिए करियर को स्थगित कर रहे है। ऐसे भी है जो सफलता चाहे वह किसी भी
कीमत पर हो उसे ही सबकुछ समझते है, मानते है। करियर ही समाज है, राष्ट्र है। ‘नैतिकता और मूल्य पलायन है’।
सब कुछ के बावजूद कही ना
कही से कुछ छूटा नजर आ रहा है। लगता है कुछ स्थगित हो गया है। युवाओं की एक बड़ी
जनसंख्या को वह मार्ग नहीं मिल रहा है जिससे जीवन और संघर्ष को सार्थकता मिल सके। जिन्हें
आज की ख़बर नहीं कल का पता नहीं, आर्थिक मंदी से जूझता युवा गलत रास्तों का आश्रय
लेना क्यूं चाहता है।
यदि किसी युवा से पूछा जाए
कि आप किसे अपना आदर्श मानते हैं तो ज्यादातर युवा खिस्यानी बिल्ली की तरह खम्भा
नोचते हुए नजर आएंगे। लगता है हमारे सामने ऐसा कोई नायक नहीं है जो उन अधूरे, बिन
देखे सपनों को तराश सके । इस वैश्विक
दुनिया में पास-पास होते हुए हम दूर होते जा रहे है। ग्लोबल गांव के वाशिंदें हम सभी
संवादहीनता से जूझ रहे है। मीडिया माध्यमों, फेसबुक, ट्वीटर, लिंकइन, गूगल प्लस
सभी तो हैं लेकिन क्या है कि हम नायकविहीन से हो गए है। हमारी संवेदनाओं का चीर-हरण
हो रहा है। भावनाएं सिमट रही हैं। ज्ञान- विज्ञान और सूचना संसार की तकनीकों से
लैस हम सभी सिमटे हुए लगते हैं। कहा तो यह जा रहा है कि मानवीय सभ्यता का यह एक
उत्कर्ष काल है। जिसमें सुविधाओं का अंबार है।
अब जब कि समाजवादी सपने
परिसरों में जिंदा शब्द की तरह मौजूद है। कार्लमार्क्स, लेनिन, गांधी, अंबेडकर,
लोहिया और उन तमाम मानवीय सपनों को शब्द
भर बना दिया गया है। पूंजीवाद ने मानो इस वैश्विक दुनिया में उन मूल्यों को भी
अपना बना लिया है, अपना लिया है जो उसके लिए मुनाफे बन सकते हैं। पूंजीवाद ने वेश
बदलकर, विचार धाराओं का चहरा बदल कर वैचारिक आकाश को छाज दिया है। युवा की आंखों
में बड़े-बड़े सपने हैं। बड़ी उम्मीदे है और इन उम्मीदों को पूरा करने की ओर बढ़ते
छोटे-छोटे कदम कब काल कोठरी तक जा पहुंचते हैं, यह उन्हें खुद भी पता नहीं चलता।
युवा रुमानियत की दौड़ में अंधे हुए नंगे पैर ऊचाइयों को छूने की चाह में सरपट
दौड़ रहा है। जिनकी न कोई मंजिल है न कोई ठिकाना। आज आधी आबादी से ज्यादा युवा
दिशाहीन हैं। उन्होंने न तो मार्गदर्शन देने वाला है और न कोई मंजिल की राह में रोशनी
दिखाने वाला। इस दुर्दशा के बड़ी हकदार अशिक्षा है।
जीवन को सुंदर, सार्थक और
सुचिंतित बनाने के लिए जिन लोगों ने सपने देखे हैं उन सपनों को उड़ान देने की
जरूरत है। लेकिन सपनों की उड़ान जगह एक लक्ष्यहीन लक्ष्य हमारे सामने है। हिंसक
परिदृश्य में युवाओं को रास्ते की तलाश है। रोज ऐसे सैकड़ों उदाहरण लिए जा सकते है
जहां लूट-पाट, डकैती, चोरी, दंगा-फसाद घटित हो रहे है कही ना कही हर क्षण हर रोज
ऐसे में युवा क्या करे ?
-सुरेंद्र कुमार
अधाना
Wednesday, 15 August 2012
स्वतंत्रता के बदलते मायने...
स्वतंत्रता के बदल गए मायने... अब भी लोग स्वंय को आजाद महसूस नहीं करतें। इसके
पीछे सब की ब्यथा भिन्न-भिन्न है। कही किसी को कानून की जकड़ ने गरीबी दे दी। किसी
के संविधानिक अधिकारों का गला घौंटा गया। कही किसी सरकारी विभाग में अपने हक के
किसी व्यक्ति ने जीवन का बलिदान दे दिया। क्या ऐसे सक्श के परिजन स्वंय को
स्वतंत्र महसूस करेंगे ? यदि करेंगे तो उसके मायने और विचार ओर लोगों से अलग होंगे।
भारत की अंतरिक छवि उसके मंत्री, अधिकारी और तमाम सरकारी महकमों में बैठे सैकड़ों
उन लोगों द्वारा बनती है जो कि हिंदुस्तान की कार्यपालिका, न्यायपालिका और
विधायिका को चलाने के लिए एक मजबूत स्तंभ हैं। यदि किसी गरीब व्यक्ति को अपना
बीपीएल कार्ड बनवाने के लिए बेफ्जूल का समय, धन और हाथ-पैर जोड़ने के बाद भी मूंह
की खानी पड़ती है तो उसके लिए 15 अगस्त या 26 जनवरी के कोई मायने नहीं होते।
भारतीय सरकारी महकमें की वास्तविकता जानते हुए भी आला आधिकारी, मंत्री, नौकरशाही
मौन बैठे रहते है। काम यू ही बदस्तूर जारी रहता है। कहा जाता है-पढ़ेगा इंडिया तभी
तो बढ़ेगा इंडिया ....आडिया बहुत ही उम्दा किस्म का है। मैं यकीनन कह सकता हूं कि
ये विचार किसी मंत्री को तो नहीं आया होगा। क्योंकि कुछ लोग देश की जनता को
शिक्षित देखना ही नहीं चाहते। यदि अधिकारों की बात की जाए तो एक पढ़ा लिखा व्यक्ति
भी देश के गौरव, मान-सम्मान और गरीमा के लिए उतनी शिद्दत से स्वंय को देश भक्त
नहीं कहलाना चाहता। क्योंकि कही न कही किसी बात से वह भी आहत होता है। यदि अरविंद
केजरीवाल एवं मनीष सिसौदिया जैसे लोग आवाज़ बुलंद करते हैं तो मंत्री और सरकार को
उसमें, उनके हित नजर आने लगते है। एक पढ़े लिखे नागरिक आए दिन पासपोर्ट बनवाने के
ऑफिस के लिए चक्कर कांटते देखे गए है। जिनमें कुछ लोग तो ऐसे हैं जो सालों से लाईन
में इसलिए लगते आ रहे है कि उनके पास पुलिस या पता बेरिफिकेशन करने वाले की जेब
गरम करने के लिए रुपया नहीं है। ऐसे में कई सालों तक चक्कर काटने के बाद हताश
नागरिक देश पर गर्व किस प्रकार कर सकता है। ये बात वे पढ़े लिखे अधिकारी भी जानते
है कि क्यों किसी की फाईल बंद कर दी गई। या पासपोर्ट रद्द कर दिया। लेकिन कोई जहमत
उठाने वाला नहीं है। हमारे यहां नागरिकता के मायने कुछ इस तरह है कि आप को जरूरत
पासपोर्ट की होगी लेकिन कार्य आप के वोटिंग कार्ड के लिए ज्यादा शिद्दत से कराए
जाते है। जिसमें हम आम नागरिक अपना ज्यादा हित खोजते है लेकिन वास्तविक हित तो कुछ
ओर ही होता है। अब जनता भी सब जानती है सरकार भी सब जानती है। लेकिन अधिकारों की
लड़ाई में आम व्यक्ति बौना पड़ जाता है जीत बाहुबलि की हो जाती है।
- सुरेंद्र कुमार अधाना
Sunday, 5 August 2012
यादें कुछ यू आती है...
यादें कुछ यू आती
है...ताजी हवा की तरह
आती और चली जाती हैकभी होंठो पर
छोटी सी मुस्कान, तो कभी आखों में
चमकगालों पर लाली और
सासों में शीत अहसास दे जाती है।चांदनी छटा की
तरह आप का दृश्य कभी-2 नज़र आता हैसोचता हूं कि कभी
यह अपना था.....जो धीरे- धीरे
वीरान सा हुआ जाता है।सावन भी भिगो
जाता है बार-2 आप के दामन कोजिसको सुखाने की
कोशिश में....मेरे यादों का
सागर उमड़ आता है।रोकना चाहता हूं
मैं इन उठती घटाओं कोहंसता हूं कि
पागल मन ऐसा क्यों चाहता है।टीस सी उठती है
मन में जब...जब इस दामन में
किसी का स्पर्श हो जाता है।फिर दिल को
तस्सली देता हूं ...कि ये तो प्रकृति
है भला इसे भी क्या रोका जा सकता हैयादों ने तो जड़
कर दिया है, मौसम की रावानगी
को भीतो इस बादल पर
मेरा वश क्यों नहीं चल पाता है ?
..........© सुरेंद्र कुमार अधाना.........
..........© सुरेंद्र कुमार अधाना.........
Thursday, 2 August 2012
आज अचानक आप हमें ना जाने क्यू याद आए हैं
यादों के मुकाम में हमने
नित नए सपने सजाए हैं...
आज अचानक आप हमें ना जाने
क्यू याद आए हैं...
हमने तो दफन कर ली है अपनी
संवेदनाएं भी...
बार-बार आंखे क्यूं आप का
चहरा दिखाए हैं...
आज अचानक आप हमें ना जाने
क्यू याद आए हैं...
हमने तो यादों को सचेत कर
दिया था कि...
बीते पलों की याद न दिलाया
करें हाल-ए-दिल को...
इस विरह की बेला को क्यों
फिर से याद कराए है...
आज अचानक आप हमें ना जाने
क्यू याद आए हैं...
पुराने गीतों की तरह सोना
सी हो गई हैं अपनी यादें...
जिनकी कीमत समय के साथ-साथ
स्वयं बढ़ जाए हैं...
आज अचानक आप हमें ना जाने
क्यू याद आए हैं...
खूखे फूलों की पत्ती की तरह
हो गई है जिंदगी अपनी...
लेकिन मध्म-मध्म खुशबू फिर
भी न जाने कहा से आए है...
आज अचानक आप हमें ना जाने
क्यू याद आए हैं...
बड़ी मुश्किल से मन को
लगाया था अपने को संभालने में...
लेकिन न जाने क्यूं ये दिल
फिर भी आप की ओर खिंचा चला आए है...
आज अचानक आप हमें ना जाने
क्यू याद आए हैं...
--------------- © सुरेंद्र
कुमार अधाना
दिल करता है मेघ घिर आए
दिल करता है मेघ घिर आए,
घनघोर घटाये....नीर बरसाए...
पावक (बारिश) की बूंदे पादप
(वृक्ष) पर टपकाए, शोर मचाए..दिल बहलाए...
सरोवर (तालाब) भर आए..जलाशय
बन जाए, सरिता में परिणत हो जाए...
सरोज (कमल) खिल आए... वेदना
घट जाए और हमारा वासर (दिन) बन जाए...
जलधर संग दामिनी (बिजली)
खड़खड़ाए, दिल घबराए धड़कने बढ़ जाए...
सुमन खिल आए...तितली
मंडराए....विपिन (वन) में कही खो जाए...
----------------- © सुरेंद्र कुमार अधाना
Friday, 15 June 2012
भ्रष्टाचार ने आम आदमी को खोखला कर छोड़ दिया..
भ्रष्टाचार ने आम आदमी को खोखला कर छोड़ दिया..
सत्त लेकर चंद लोगों ने धरती का दामन खोस लिया...
अहंकार उनके, अधिकार उनके,उनकी है जीवन लीला...
किसान,मजदूर, रिक्शा, दिहाडी करता फिरता है मतमिला..
इनकी चमक दमक को खा जाने वाले रहने है वातानुकूलित कारों में...
वो फिरते है भटके भटके टुकड़ों के बटवारों में....
छीन ली उनकी खुशिया, बिटायां की माथे की बिंदियां...
कैसे रहेंगे वो लोग खुश जो नहीं चाहते गरीबों के चूहले को...
राम भी देता उनको उनके ही बटवारे को ...
कही न कही आहत तो होती है उनकी भी संवेदनाएं...
कौन किस से बड़ा पता चल जाता है व्यवहारों से...
खुशियां छिपाने, नैन न मिलाते फिरते वो लोग खुशी की तालाश में...
जो छीन रहा दूसरे का टुकड़ा कहा तक बच पाए है ऐसे अधियारे से ..
एक दिन चले जाना है इन महल, भवन, चौबारे से...
किस दुख क्या होता है क्या पहचाना है इन लोगों ने ...
जो नोट की दौतल में रहते है...आंखों से अंधे हुए..
एक दिन आख खुला जानी है आंख बंद हो जाने के बाद ....
काम न कुछ आएगा समय के बीत जाने के बाद..............................©सुरेंद्र कुमार अधाना
Friday, 8 June 2012
आज अचानक आप हमें याद आए हैं..
![]() |
| सुरेंद्र कुमार अधाना |
यादों के मुकाम में हमने नित नए सपने सजाए हैं..
आज अचानक आप हमें ना जाने क्यू याद आए हैं..
हमने तो दफन कर ली है अपनी संवेदनाएं भी...
बार-बार आखे क्यू आप का चहरा दिखाए हैं..
आज अचानक आप हमें ना जाने क्यू याद आए हैं..
हमने तो यादों को सचेत कर दिया था कि...
बीते पल की याद न दिलाए हाल-ए-दिल को..
इस विरह की बेला को क्यों फिर से याद दिलाए है...
आज अचानक आप हमें ना जाने क्यू याद आए हैं..
पुराने गीतों की तरह सोना सी हो गई है अपनी यादे..
जिनकी कीमत समय के साथ-साथ स्वयं बढ़ जाए है..
आज अचानक आप हमें ना जाने क्यू याद आए हैं..
सूखे फूलों की पत्ती की तरह हो गई है जिंदगी अपनी..
लेकिन मध्म-मध्म खुशबू फिर भी न जाने कहा से आए है...
आज अचानक आप हमें ना जाने क्यू याद आए हैं..
बड़ी मुश्किल से मन को लगाया था अपने को संभालने में..
लेकिन न जाने क्यूं ये दिल फिर भी खिंचा जा जाए है...
आज अचानक आप हमें ना जाने क्यू याद आए हैं.. © सुरेंद्र कुमार अधाना
Thursday, 17 May 2012
आषाढ़ का एक दिन
आषाढ़ का एक दिन महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर केंद्रित है। जो कि 100 ई.पू से 500 ईसवी के अनुमानित काल में व्यतीत हुआ। मोहन राकेश को कहानी के बाद सफलता नाट्य-लेखन के क्षेत्र में मिली| हिंदी नाटकों
में भारतेंदु और प्रसाद का बाद का दौर मोहन राकेश का दौर है जिसें हिंदी नाटकों को
फिर से रंगमंच से जोड़ा। हिन्दी नाट्य साहित्य में भारतेंदु और प्रसाद के बाद यदि लीक
से हटकर कोई नाम उभरता है तो वहा मोहन राकेश का है। हालाँकि बीच में और भी कई नाम आते हैं जिन्होंने आधुनिक
हिन्दी नाटक की विकास-यात्रा में
महत्त्वपूर्ण पड़ाव तय किए हैं। किन्तु मोहन राकेश का लेखन एक दूसरे ध्रुवान्त पर नज़र आता
है। इसलिए ही नहीं कि उन्होंने अच्छे नाटक लिखे, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने हिन्दी नाटक को अँधेरे बन्द
कमरों से बाहर निकाला और उसे युगों के रोमानी ऐन्द्रजालिक सम्मोहक से उबारकर एक नए
दौर के साथ जोड़कर दिखाया। वस्तुतः मोहन राकेश के नाटक केवल हिन्दी के नाटक नहीं
हैं। वे हिन्दी में लिखे अवश्य गए हैं, किन्तु वे समकालीन भारतीय नाट्य प्रवृत्तियों के उद्योतक
हैं। उन्होंने हिन्दी नाटक को पहली बार अखिल भारतीय स्तर ही नहीं प्रदान किया वरन्
उसके सदियों के अलग-थलग प्रवाह को
विश्व नाटक की एक सामान्य धारा की ओर भी अग्रसर किया। प्रमुख भारतीय निर्देशकों
इब्राहिम अलकाजी, ओम शिवपुरी, अरविंद
गौड़, श्यामानंद जालान, राम
गोपाल बजाज और दिने न राकेश के नाटकों का निर्देशन कर उनका बहुत ही मनोरहर ढग से मंचन किया।१९७१ में निर्देशक मणि कौल ने इस पर आधारित एक फिल्म बनाई।
जिसको साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया। मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
को लेने पर भी आधुनिक मनुष्य के अंतद्वंद और संशयों की ही गाथा कही गई है। आषाढ़
का एक दिन में सफलता और प्रेम में एक को चुनने के द्वन्द से जूझते कालिदास एक
रचनाकार और एक आधुनिक मनुष्य के मन की पहेलियों को सामने रखा है। वहीँ प्रेम में
टूटकर भी प्रेम को नहीं टूटने देनेवाली इस नाटक की नायिका के रूप में हिंदी
साहित्य को एक अविस्मरनीय पात्र मिला है। राकेश के नाटकों को रंगमंच पर मिली
शानदार सफलता इस बात का गवाह बनी कि नाटक और रंगमंच के बीच कोई खाई नही है। अषाढ़ का माह उत्तर भारत में वर्षा ऋतु का
आरंभिक महिना होता है, इसलिए शीर्षक का अर्थ "वर्षा ऋतु का एक दिन" भी लिया जा सकता है। इसके अलावा राकेश
मोहन के उपन्यास : अंधेरे बंद कमरे, अन्तराल, न आने वाला कल। नाटक :
अषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे अधूरे और
कहानी संग्रह : क्वार्टर, पहचान, वारिस तथा अन्य कहानियाँ मुख्य हैं। उन्होने निबंध संग्रह परिवेश के अलावा मृच्छकटिक, शाकुंतलम का भी अनुवाद किया जो आगे चल कर विश्व विख्यात हुई
।
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सुंदरलाल जितने जुझारू और प्रकृति की रक्षा के लिए सक्रीय थे, उतने ही सरल, सौम् य और चिंतन-मनन करने वाले। प्रकृति के उपासक सुंदर लाल बहुगुणा...
