Monday, 24 December 2018

आखिर विफल क्यो होती हैं, नदियों को साफ करने वाली परियोजनाएं

किसी भी नीति के निर्माण के पीछे एक साकारात्मक और स्वच्छ नियत बहुत जरूरी है। जब भी कोई नीति बनाई जाती है तो उसके कारणों और सभी समुचित समाधानों का ध्यान रखते हुए काम-काज की रणनीति तैयार की जाती है। जो गत समय स्थिति होती है उस पर विचार करते हुए ऐसी स्थिति क्यों हुई उस पर भी गौर किया जाता है, साथ ही भविष्य में एक तस्वीर तैयार की जाती है कि यदि इस पर काम नहीं किया गया तो आगामी वर्षों में इसका कितना भयानक या गंभीर प्रणाम हो सकता है। ऐसे ही कुछ मामले न केवल राष्ट्र स्तर पर बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय है और अलग-अलग संगठ उस पर करोड़ों-अरबों के बजट के पक्ष में भी ताकि भविष्य की तस्वीर साफ की जा सकते और हमारे आने वाले संकटों से निपटा जा सके। 
भारत में बढ़ती जनसंख्या के साथ बहुत सी ऐसी चुनौतियां है, जो कि समय के साथ बढ़ती ही जा रही हैं। उस पर ध्यान समय से पहले देने की आवश्यकता हैं जैसे की दो साल पहले शुरू की गई ''नमामी गंगे'' परियोजना जिसमें लगभग 2400 करोड़ की लागत से गंगा को साफ करने की मंशा से शुरू किया गया। साथ ही यह भी कहा गया की आगामी पांच वर्षोंं में इसके बजट की बढ़ौती की जाएंगी ताकी गंगा को साफ किया जा सके, जिसके लिए सरकार ने पिछले साल 20 हजार करोड़ रूपये की लागत से साफ करने की नियत से इसे बड़े ही जोर शोर से राशि प्रदान करने की बात की ताकि हिंदुओं की मां कहे जाने वाली नदी ''गंगा'' का दामन कई हजार करोड़ों में धुला जा सके। साथ ही इस परियोजना के माध्यम से वन लगाने, जैव विविधता को बनाएं रखने के लिए जैव विविधता केंद्र और उनके संरक्षण के लिए कार्य करने वाली टीम के निर्माण की भी बात कही गई। लगभग 120 ऐसे शहरों को भी चयनित किया गया जिसमें घरों, फेक्ट्रियों, नालों आदि से निकले वाली गंदगी को साफ किया जा सके। गंदे पानी को ट्रीटमेंट देकर साफ किया जा सके। कोई व्यक्ति नदी में कचरा न डाले इसके लिए ''रियल टाइम मॉनिटरिंग''' जैसे टीम की व्यवस्था की गई ताकि गंदगी फैलाने वालों लोगों पर निगरानी रखी जा सके। यह सब बड़े स्तर पर किया जाएगा, जहां-जहां से नदी निकल रही है उस पर नज़र रखी जाएगी। जिसमें बहुत बड़ी राशी खर्च होने का अनुमान है तथा हर साल उसे बनाएं रखने के लिए कई हजार करोड़ रूपये खर्च करने की केंद्र सरकार की परियोजना है। 
गूगल की सहायता से फोटो प्राप्त की गई है।  फोटो-1
यदि इसका इतिहास देखे तो सन् 1985 से चल रहे गंगा साफ करने के कार्य पर लगभग 4000 करोड़ रूपये खर्च हो चुके है। अलगे तीन सालों में और अधिक बजट बढ़ाने की परियोजना है। यदि बड़े संदर्भ में देखे तो साफ पानी, हवा और स्वच्छ वातावरण बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसका बड़ा कारण केवल यह नहीं है कि सरकारें काम नहीं कर रही है बल्कि कमी इस बात की है कि काम नियोजित तरीके से नहीं किया जा रहा है। सरकारी परियोजनाओं का बटवारा हकीकत में सही परियोजनाओं में न लगना या कम लगना है। सरकार के सामने कुछ बड़ी समस्याएं हैं जैसे जनसंख्या, इसका नियोजन और सुविधाओं का आवंटन लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है कि सरकारों को कड़े फैसले लेने होंगे। पर्यावरण, पानी , हवा सब की है इस को गंदा करने के लिए किसी भी उद्योग को खुला नही छोड़ा जाना चाहिए कुछ नियंत्रण- नियोजन के साथ जरूरी है। जो कि किसी भी सरकार को निजी हित को अलग हट कर लेने होगे। पानी, पर्यावरण और हवा को स्वच्छ बनाने के लिए भी कानूून बनाने होंगे। प्लास्टिक, बीड़ि, तम्बाकू, निजी यातायात पर भी नियंत्रण जरूरी है। तभी स्थित साफ हो सकेंगी। हर एक शहर प्लास्टिक और पालीबेग के प्रयोग के  कारण प्रदुषित हो रहे है इन्हें तत्काल प्रतिबंधित किए जाने की आवश्यकता है।
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नदीं को साफ नियती से नहीं नियंत्रण से साफ कराना होगा। जिसके लिए नागरिकों को भी आगे आने का आवश्यकता है ताकि काम आसानी से हो सके। पर्यावरण को हरा भरा बनाएं रखने के लिए सरकारों को मुक्त में पैध शाला निर्माण की जरूरत है, जिसपर सरकारें बहुत ही लचर काम कर रही हैं। सभी को पता है कि पर्यावरण ही हमारी धरोहर है हम उसे से जीते है, जानकर भी हम खुद उसे खत्म कर रहे है जिसके बिना एक दिन हम ही स्वत: ही खत्म हो जाएंगे। जागरूकता फैलाने से भारत जैसे देश में काम नहीं होगा। हर संभव कानून बनाने होंगे और अच्छा काम करने वालों को प्रोत्साहन करने की भी आवश्यकता है।    

Sunday, 23 December 2018

फसल बौता किसान है, लेकिन उसे काटते पूंजीपति है

देश के सात दश्कों बाद भी किसान बदहाल स्थिति में है। किसान की आर्थिक स्थिति आज भी नहीं सुधरी है, आंकड़े कुछ भी कहे, पक्के मकान कितने भी बन जाए, किसान के घर में ट्रेक्टर, कार देख अमुमन यही अनुमान लगाया जाता है कि किसान को अच्छी खासी रकम मिल रही है, लेकिन हकीकत कुछ ओर  ही है, जिसके केवल किसान और नीति निर्मात ही जान सकते है। कई ऐसी फसले है जिन्हें  किसान ऊगाना नहीं चाहता लेकिन किसान के फसल चक्र या यू कहे की मजबूरी में किसान उन फसलों को उगाता है। साथ ही अपनी जीविका के लिए बाजार पर निर्भर रहता है, यदि बाजार में भाव अच्छे मिल गए तो अच्छी बात, नहीं तो कई बार ऐसा भी होता है कि उसकी लागत भी नही मिल पाती है। ऐसे में मौसमी सब्जी उगाने वाले किसानों पर संकट अधिक रहता है। साथ ही कैश क्रोप उगाने वाले किसानों की भी चुनौती कम नहीं है , यदि गन्ना, कपास और तिलहन जैसी फसलों को उचित दाम समय पर नहीं मिल पाता है। साथ ही कुछ ऐसी फसले भी हैं जिनके आधार मूल्य सरकारों ने सुनिश्चित किए जुए है लेकिन जब किसान अधिकता में कोई भी फसल लेकर जाता है तो ऐसे में सरकारी गल्ले भी हाथ उठा देते है ऐसे में किसाने के पास केवल प्राइवेट बाजार ही बचता है जोकि प्रतिस्पर्धा का शिकार है जिसमें लगभग आधे दाम पर पक्की फसले बिकती हैं। मुझे याद है कि मेरा परिवार आलू की खेती बड़े पैमाने पर किया करते थे, खुद की आढ़त, मशीन, ट्रेक्टर और  स्वंय की सिचांई व्यवस्था होने बाद जब आलू की फसल तैयार होती थी तो वह लगभग एक ट्राली 8000 रूपये के आसपास जाती थी। जिसमें दैनिक 50 लोगों की मजदूरी, आढ़त का खर्च, मंड़ी का शुल्क, पानी, खाद, खेत की जुताई, खुदाई, भराई, सफाई फिर बाजार में प्रतिस्पर्धा की मार इतनी होती थी कि थैली में सबका चुकाने के बाद कुछ हजार रूपये ही बच पातेे थे। जो कि या तो टैक्टर की किस्त में चले जाते थे, या दुनाके के उधार में चलते जाते थे जिससे से तीन माह से उधार लिया जा रहा है। या फिर हम भाइयों की फीस में चले जाते थे। फसल उगी भी थी इसका पता ही नहीं चलता था। किसान उस समय भी ठगा महसूस करता था और आज भी लग भग वही हालत है। अब हमने आलू बैने की जगह गन्ना लगाना शुरू किया है। जिसका अलग नुकसान है, साल भर उसे तैयार करो, घर से लागत लगाओं फिर उसे मिल में डाल कर अपने घर पर्ची लेकर भगवान से फिर प्रार्थना करों की मिल मालिक उसका भुगतान जल्द कर दें, लेकिन ऐसा होता नहीं है। सर्दियों में हमें भर पूर सब्जी मिलती है, जिसमें हम ऊंचे दाम पर लेकर खाते है, लेकिन यदि आप मंड़ी में जाएंगे तो वास्तविक मूल्य कितना मिलता है आप जान पाएंगे। किसानों की हालत दिखती ही अच्छी है, लेकिन वास्तविकता यह है कि है नहीं। यही कारण है कि कोई भी किसान अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता।

Monday, 3 December 2018

पहले समस्याएं पैदा की जाती हैं फिर बाजार

आज भारत के बड़े शहर की सबसे बड़ी समस्यां को नव्ज़ को टटौले से बड़ी समस्यां जल और हवा है। जिसको फलने-फूलने के लिए वातावरण स्वंय हमने ही तैयार किया है। हम अब अधिक जागरुक होकर भी, अपनी समस्यों को अधिक बढ़ा रहे है। बड़ी समस्यां यह भी है कि हम खामियों को जानते हुए भी उन्हें दूर करने का प्रयास भी नहीं करना चाहते। जीविका हमारी है, जीवन हमारा, वातावरण हमारा है और हमारी कोशिश होती है कि उसे साफ स्वच्छ बनाने के लिए कोई दूसरा व्यक्ति पहल करेगा, ऐसा ना कभी हुआ और न ही होगा । हां एक काम हो सकता है जो हो रहा है, कि आप टेक्स दें और सरकारे या कार्यालय आप को सुविधा उपलब्ध कराएंगी लेकिन उसके भी सार्थक काम नहीं हो पा रहा है। सरकारें जहां नाकामयाब साबित हो रही हैं तो प्राइवेट फर्म उसमें सेवा भाव से आती है और फिर उससे लाभ कमाने लगती हैँ।
हाल ही के दिनों में देखा जाएं तो बड़े-बड़े शहरों में दीपावली के समय बड़े वाहनों और निर्माण कार्य को इसलिए रोकना पड़ा ताकि दीवाली के त्योहार पर वातावरण में प्रदूषण की इतनी अधिकता न हो जाएं जिससे लोगों को अपनी जान से हाथ न धोना पड़ जाए। ऐसा क्यू होता है, कि हम जब ही जागते है जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है। आज वाहनों का आवागमन, वाहनो की बिक्री व हवा में जहर घोलने के लिए सभी आजाद है। भारत में इसपर कोई प्रतिबंध नहीं आप खुल कर अपने राष्ट्र को दूषित कर सकतें हैं। इतना ही नहीं उद्योगों से निकलने वाली जहरीली गैस, जहरीली हवा भी गंभीर समस्यां है। जिस पर व्यवस्थाएँ गौर करने के बजाएं केवल बाजार उपल्बध कराने की होड़ में है ताकि अधिक लाभ कमाया जा सके। देश के बहुत सारे क्षेत्र ऐसे है जहां उद्योगों की आवश्यकता है लेकिन गैर सरकारी उद्योगपतियों की प्रथमिकता केवल बड़े शहर ही होते है, ऐसे में उन्हें कार्यालयों से अनुमति भी मिल जाती है और स्थान भी। शहरों की हवाएं जहरीली और पानी दूषित होता जा रहा है। जिसके लिए बाजार में उससे बचने के उपाए तो लेकिन स्थिर और भविष्य के लिए कोई साकारात्मक पहल नहीं है। फेक्ट्रियों और तेल से चलने वाले वाहनों ने हम में ज़हर घोल दिया है। शायद ही कोई ऐसी अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट हो जिसमें हम 100 वें पायदान से पर हो। 
पानी की समस्याएं सरकार भी जानती है जनता भी.... उसके बाद भी उसको बचाना और संरक्षण पर कोई पहल नहीं की जा रही है। आज खुले आम जमीन के अंदर से पानी बेलगाम  सींचा जा रहा है, कही पानी की खुलेआम बर्बादी हो रही है। कही नगर निमन की पाइंप  लाईन से 24 घंटे पानी का रिसाव होता रहता है। कही प्राइवेट उद्योग न केवल जमीनी पानी का स्तर कम कर रहे हैं बल्कि जमीनी और नहर, नदी के पानी को भी दूषित किया जा रहा है। हम आर.ओ. से पानी साफ तो कर रहे हैं, साफ पानी को पहले गंदा कर रहे फिर उससे साफ करने के लिए 2/3 पानी खराब भी कर रहे है। साथ ही भविष्य में पीढ़ी के सामने सस्याएं पैदा कर रहे है कि आप अपना सोच लो हमने तो ऐसे तैसे काम निकाल लिया है। बाजार हमेशा आपकी मजबूरी का फायदा उठाता है। पानी और स्वच्छ हवा न मिलने के चलते जिस तरह से विज्ञापनों के माध्यम से हमें डराया जा रहा है उससे लगता है कि हमें अब तक तो मर जाना चाहिए था लेकिन पता नहीं हम अभी तक जीवित कैसे है। पिछले 10 सालों में गौर करें तो सबसे ज्यादा इजाफा  जल और हवा की गुणवत्ता में गिरावट आई है और जनसंख्या में वृद्धि हुई है। आज केवल शहर ही नहीं गांव भी फैल रहे है। पॉलीथीन का प्रयोग, धूम्रपान, गुटखा, अप्रत्याशित वाहनों की अंधाधुत बिक्री और खरीद, पेड़ो की कटाई, पानी की अनियोजित प्रयोग ये कुछ ऐसे गंभीर मुद्दे है जिसे घर-घर का मुद्दा होना चाहिए, लेकिन यह मुद्दा सरकारी मेनिफेस्टो का हिस्सा है जब समस्या घर से निकल कर गांव, ब्लाक और जिला स्तर की समस्या बन जाती है तो ऐसे में बड़े खर्च की जरूरत पड़ती है। 20 साल पहले गांवों में गंदगी नहीं होती। गांव भी अब बाजार का गुलाम हो गया है। गांव के बाजारों में अब बड़े स्तर पर पॉलीथीन का प्रयोग होने लगा है। शहर से निर्मित वस्तुएं सड़क बन जाने से गांव में आने लगी है। उसी के कारण कूड़ो के ढ़ेर जो शहर में मिलते थे वह अब गांव में घर कर गए है।

Thursday, 24 May 2018

स्वच्छ भारत अभियान 'किसके लिए और क्यों ?'

भारत सरकार का स्वच्छ भारत अभियान कई सालों से चलता आ रहा है। जिसके लिए करोड़ों रूपये और लाखों की संख्या में नगर पालिकाओं के कर्मचारियों को लगाया गया है। समय-समय पर केंदीय सरकार ने नागरिकों से भी अपील की कि साफ-साफाई करने के लिए वह भी योगदान दें, लेकिन एक सजग नागरिक को शायद पता है कि यह जिम्मेदारी किसकी है। ऐसे में भारत के बड़े- बड़े महानगरों के साथ  बड़े नगरों और औद्योगिक क्षेत्रों को सुंदर बनाने के प्रयास ने बहुत से शहरों को चमका दिया है। 
सरकारों ने शहरों के लिए और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए साफ-सफाई के लिए अगल-अगल व्यवस्था की है। अगल बजट दिया है, छोटी-छोटी सुविधाएं भी दी है ताकि वहां के वातावरण को साफ किया जा सके। ग्राम सभाओं को और नगर पालिकाओं को इसके लिए परिवहन और मैला ढौने के लिए सुविधाएं दी है, ताकि नागरिकों द्वारा की जाने वाली गंदगी को साफ किया जा सके।  फिर भी स्वच्छता हमारे आस-पास  दिखाई नहीं देती .....आखिर क्यों ?  क्या कारण है ? सफाई क्यों नहीं हो रही है ? इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? यह सब कौन कराएगां आदि सवाल हमारे पास हैं और उनके जवाब भी.....। शायद भारत को कोई भी ऐसा शहर नहीं होगा जहां गंदगी न हो, लेकिन कुछ शहरों में यह अझेल हो गई है। कई स्थानों पर तो गंदगी के ढ़ेर लगे। कई मीटर तक गंदी बदबू जाती है। वहा के आसपास की मिट्टी भी गंद मय हो गई है। लोग वहा से आना जाना भी पसंद नहीं करतें। यह सभी कमियां कुछ व्यवस्थाओं की हैं... बाकि कमी नागरिकों की। यदि तालमेल अच्छा हो तो सफाई का वातावरण बनाया जा सकताा है। जो कि स्वयं न तो सरकार के बस  में हो न ही नागरिकों के। सरकार के कुछ विभाग जो अच्छा कार्य करते है उनकी चमक दिख जाती है। मेरठ में पहल -एक प्रयास और मेरा शहर और मेरी पहल जैसे कुछ लोगों के समूह मेरठ व आसपास के जिलों में बहुत ही शानदार काम कर रहे हैं। गंदगी को कम करना कोई बड़ा काम नहीं है बस हमें एक दूसरे के साथ मिलकर उस पर रोज थोड़ा थोड़ा काम करना है और सभी को सफाई के प्रति सजग होकर हाथ बटाने की जरूरत है। जब हम गंदगी करने के लिए अपने हाथ बढ़ा सकतें है तो उसे दूर करने के लिए भी एक जुट हुआ जा सकता है।
यह समस्यां बाहर से नहीं आई है। यह सब हमारी ही देन है और हमें यदि इसे खुद भी दूर करना पड़े तो हमें ऐसा करने में कोई कोताही नहीं करनी चाहिए। हम दिन भर दूसरों की कमियां तू ढूंढ़ सकतें हैं लेकिन एक सबल विचार क्यों नहीं ला सकतें। जो लोग अच्छा काम करते है यदि उन्हें लोगों का सहयोग नहीं मिलता है तो उनकी आस भी टूट जाती है। हमें उनके उत्साह को बनाएं रखे रहना होगा। आगेआकर कार्यकरना होगा। व्यवस्थाएं हमेंशा समूह से नहीं बदली है, एक व्यक्ति के प्रयास से भी तस्वीर बदल सकती है। ऐसे में हमें खुद को कमजोर न समझे हुए अकेले भी कुछ योगदान देना पड़े तो हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए।

Monday, 6 November 2017

जल पर पूंजीवादी व्यवस्था हावी ना हो

“कहा जाता है, जल है तो कल है” और “जल ही जीवन है”
हकीकत यह है कि हम उस देश के, उस मांटी के लाल है, जो भाइचारें, आपसी सोहार्द, अतिथि देवों भव: आदि न जाने कितनी कहावतों को न केवल हमने बनाया है बल्कि उन्हें जिया भी है। हमारे जीवन में दोस्ती, अपनापन, प्रेम, दूसरों के प्रति आदर, सम्मान, उनकी सहायता करने में हमारी तत्परता हमेशा से हमारे खून में रही है।  
आज पूंजीवाद का बोल-बाला है। लोगों की पूंजीवादी लालसा और सोच ने मानव चरित्र को दूषित किया है। हमें पता है कि हमारी जरूरत कितनी है। हम कितने में आराम से रह सकते है, लेकिन अब यह सोच पुरानी हो चुकी है। आज जमाना मोटी कमाई करने वालो का है। अब हम बच्चों के चरित्र, उनके व्यवहार, उनके आचरण की बात नहीं करते। आज हमारे बीच से बच्चों में चरित्र निर्णाण और उससे उनकी पहचान मिटने लगी है। ''आज पहचान वही बनाता है जो ज्यादा कमाता है।''
पूंजीवाद सोच ने हम सबको एक दूसरे से अगल करने का काम किया है। आलम यह है कि व्यक्ति दूसरे व्यक्ति में अपनी कमाई खोजता है। जैसे- मार्केटिंग में कहा जाता है कि आज सफल वही है जो गंजे को भी कंघा बेच दे। मैं अपने शहर के उन चौहारों को देख कुंठित हो उठता हूं जिन चौराहों पर कभी नल हुआ करते थें। वह आज सूख गए है...। कराण उनका पानी नहीं.., ना ही जलस्तर है। बल्कि कुछ तथाकथित लोगों की करामात है। उन स्थानों पर यदा-कदा किराना की दुकान खुल जाने से कुछ छोटी मानसिकता वाले लोगों ने उन नलों को बली चढ़ा दिया है ताकि वह किसी प्यासे राही की प्यास न बुझा सके। ऐसे में पानी की बोलत की बिक्री के लिए न जाने कितने भारतीयों ने अपनों के मुहं से पानी की बूंद-बूंद को छीना है। मैं देखता हूं कि बहुत से ढ़ाबों पर अब नल नहीं मिलता, यदि होता है तो उसे ऐसा स्थान दिया जाता है कि उससे पानी न पिया जा सके। यह सोच हम भारतीयों की कभी थी ही नहीं और कभी हो भी नहीं सकती है, लेकिन जो बर्वादी का वातावरण हमारे लिए तैयार किया जा रहा है उसे मन की आखों से देखने की जरूरत है।

जल हमारे जीवन का लिए नैसगिंक हिस्सा है। यदि पुराने दिनों को याद करें तो चुनावी मुद्दों में भी एक मुद्दा नलकूपों को लगवाने, पियाऊ खुलवाने का हुआ करता है। हमारी बसों के अड्डे, रुकने का स्थान जल की व्यस्था के अनुरूप ही हीता था। जिन्हें “सराय” के नाम से जाना जाता है। यदा-कदा कुछ स्थान ऐसे होते थे जहां लोगों का आवागमन ज्यादा हुआ करता था वहां पर भी पानी की व्यवस्था के लिए लोगों की मांग नल लगवाने की ही हुआ करती थी। चाहे उसका खर्च स्वयं उन्हें ही वहन क्यों न करना पड़े। कुल सामाजिक लोगों ने शीतल जल मुक्त में मिले उसके लिए पियाऊ की भी व्यवस्था देश के लगभग हर शहर में देखी जा सकता है। जो आपसी सहयोग की मिसाल है। लेकिन पूंजीवादी सोच ने अब एकल वादी सोच और स्व-उत्थान की विचारधारों को रौपने का काम किया है जहां हम हर चीज़ में अपना स्वार्थ खोजने लगते है। ऐसे में एकल-वादी सोच हमारे संस्कार, सभ्यता और परिवार की परिधि पर प्रहार की तरह है जो केवल विध्वंस करना जानती है।
ऐसे में हम प्रत्येक को पूंजीवादी व्यवस्था से उभरना होगा। जनकल्याण या जनहित में छोटा कार्य ही सही... जरूर करना चाहिए। अच्छे लोगों की अभी भी कमी नहीं है ... जब हम अच्छा सोचेगे तभी तो अच्छा कर पाएंगे। इसी लिए स्वयं से शुरुआत करे। मैं यकीन दिलाता हूं आप को अच्छा जरूर लगेगा। 



Friday, 11 August 2017

मुख्यधारा की ख़बरों का संकट

आजकल अखबारों और टीवी चैनलों को देखने पर मन-मस्तिष्क पर उदासीनता छाने लगी है। ख़बरों को देखे तो उनकी दुनिया और उसकी धूरी सिमटने लगी है। टेलीविजन पर करोड़ों की संख्या में से केवल सीमित लोगों, सीमित विषयों और सीमित क्षेत्रों की बात होने लगी है। राजनीति, क्राइम, पेज-3 और सरकारों के वादे ही आजकल टीवी स्क्रीन पर दौराए जा रहे है। चुनाव का कवरेज इतना बढ़ गया है, लगता है कि पूरा देश ही वोट डालने निकल पड़ा हो। ख़बरों का केंद्रिकरण होने लगा है। जन-सामान्य की स्थितियां टीवी चैनलों में गोण होने लगी है। राजनीति फण्डे इतने बढ़ गए है कि लगभग हर दिन कही ना कही धरना प्रदर्शन, विरोध, शक्ति प्रदर्शन, ज्ञापन सौपे जा रहे है। स्थिति ऐसी लगती है कि कहीं शांति का माहौल है ही नहीं, हर तरफ कलह, मायूसी, दर्द दिखाई दे रहा है।
समाचारों चैनलों में अच्छे लोगों की छवि दिखना बंद हो गई है। कई-कई घंटों के कार्यक्रम हेवानियत और औछी सोच वाले लोगों को दिखाया जा रहा है। यह शायद सामाज का वह पक्ष है जो दुषित होकर गल-सड़ रहा है और ऐसी सड़न को हर घर देखना नहीं चाहता। नाकारात्मक ख़बरों की बाढ़ सी आ गई है। हर रोज कई अख़बार के पन्ने और टीवी के कई घंटे इसी में व्यर्थ हो जाते है। अगले दिन फिर वहीं चीज़ दौहराई जाती है। हर रोज हेवानियत से भरी ख़बरें आती है छोटी-छोटी बच्चियों पर अत्याचार किया जा रहा है। लड़कियों के साथ ही एक आम आदमी खुद को बहुत ही असहाय और मजबूर महसूस कर रहा है। ऐसे में विचार किया जाना चाहिए कि हम कैसे समाज और कौन से दौर से गुजर रहे है जो इतना भी सभी को स्वतंत्रता नहीं दे पा रहा है कि सभी खुली हवा में सांस ले सके। अपनी इच्छानुसार काम कर सके। मुझे लगता है ऐसे में न्यायपालिका को तेजी से काम-काज करने की आवश्यकता है ताकि नाकारात्मकता पर विराम लगाया जा सके साथ ही मीडिया की भी अपनी अहम भूमिका है जिससे वह समाज में सुधार ला सकती है।

Tuesday, 2 May 2017

जो मजदूर है वह मजबूर है।

मजदूर शब्द से ही गुलामी की बू आती है। ऐसी बू जिसमें आदमी विशेष का कोई महत्व नहीं रहता है। चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़। आर्थिक मजबूरी ने लोगों को मजबूर बना दिया है। जब तक कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से अपने को स्वतंत्र नहीं कर लेता है। तब तक वह घुट-घुट कर अपनी जीविका चलाता है। निजी क्षेत्रों ने इसे और बढ़ाया है। ऐसे में व्यक्ति विशेष बिना किसी राय के जो आदेश मिलता है उसका पालन करता रहता है। रोजगार करते हुए कोई सुविधा मिल जाए तो ठीक है, कोई नई उम्मीद करना शायद उसको नसीब नहीं। कारण बाल-बच्चे और परिवार की जिम्मेदारी बहुत सी जनता को खुलकर सोचने के लिए शायद स्वतंत्रता नहीं देती। भारत जैसे देश में लोगों की मंशा कुछ ऐसी है कि यदि कोई व्यक्ति किसी मजबूर व्यक्ति को रोजगार देता है भी है तो ऐसे बहुत कम लोग होंगे जो उसकी मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहेगा।
बहुत से लोगों को वाह-वाही, जय-जयकार,जी-हजूरी ही पसंद है, यदि उनके सामने कर्मचारी नहीं झुका, दुआ सलाम नहीं की तो ऐसे में नौकरी की छुट्टी समझों। 

Thursday, 2 March 2017

सरकार की मंशा और जनता की आकांक्षाएं

सरकार की मंशा और जनता की आकांक्षाएं के बीच बहुत बड़ा अंतर प्रत्येक मेनिफेस्टों में साफ देखा जा सकता है। इसको आप हाल ही चुनावों में स्पष्ट रूप से देख सकते है। उम्मीदवारों के द्वारा दिए जाने वाले वादे और जनता की आवश्यकताओं को टटोलकर ही अलग-अलग जगहों के मेनिफेस्टो तैयार किए जाते है। यदि पुराने 15 या 20 साल पहले के मेनिफेस्टों को देखे तो यह सभी बाते दौबारा दौहराती हुई देखी जा सकती है। कहने का मतलब साफ है मंत्रियों या उम्मीदवारों को पता है कि कहां पर क्या काम किया जाना है फिर भी पांच साल कम क्यों पड़ जाते है ? फिर से उन्हीं बिंदुओं पर काम करने की जरूरत क्यों होती है ? यदि किसी कार्य के लिए पांच साल कम है तो ऐसी स्थिति में मेनिफेस्टों में वादे उसी रूप में किए जाने चाहिए। जनता को भी समझना होगा की वह किस मुद्दुओं पर काम करना चाहता है और काम करने की रणनीति क्यों होगी।
बहुत सी जनता केवल कुछ रोज मर्रा की चीजों के लिए अपने वोट को लुटा देते है, वास्तविकता अधिकांशत. यह जिम्मेदारी सरकार की स्वत. सभी नागरिकों को दी जाती है, लेकिन जानकारियों का अभाव के चलते जनता यह नहीं जान पाती है कि उसे कैसे, कब और किस तरह प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे में उम्मीदवार उन सभी चीजों का आश्वासन देकर वोट पाने की जुगत करने से कभी गुरेज नहीं करते। यदि व्यवहारिक रूप से इन सभी समस्याओं को देखे तो बहुत सारे नागरिकों के पास आज भी कोई-बड़े मुद्दे नहीं है। बहुत सारी जनता अपने आप में फसी हुई है। यदि किसी मुद्दे पर बात भी की जाती है तो उम्मीदवार वादा करते हुए साफ मना भी इस रूप में कर देता है कि यह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है या फिर सरकार द्वारा उतना फंड नहीं मिला है जिससे काम किया जा सके। यह हम सभी वोटर को समझना होगा की उम्मीदवार जो भी वादे कर रहा है वह कितने धरातल से मेल खाते है। आपने मत के अधिकार का प्रयोग हम जाति, समाज और धर्म से ऊपर उठ एक ऐसे उम्मीदवार को चुने जो सही में जनता के मर्म को समझता है और जनहित में काम करना चाहता है।  

Thursday, 22 December 2016

मेरी प्रिय बेटी "नंदनी"

छोटी- छोटी आंखे है उसकी, छोटे-छोटे हाथ।
कभी भी मुस्कुरा देती है, बिना किसी के साथ।।

उसे न किसी की बात सुहाए, न भाए बरसात।
वह अपनी ही धुन में रहती , चाहे रात्रि हो, चाहे प्रभात।।

सारे दिन वह भर-भर सोए, रात्रि में हो जाए उठ तैयार।
रातों में वह सपने बुनती, सुबह थक, सो जाए भरमार।।

सभी को वह टक-टक देखे, पहचाने सबको बार-बार।
थोड़ी देर में सब भूल जाती, फिर से जांचे बारम्बार।।

मैं तरस्ता हूं, उसके एक दिदार को।
प्रेम उसे करता हूं... अथाह ! भरमार !!

© सुरेद्र कुमार अधाना
दिनांक : 22 फरवरी 2015 (कविता लिखने की तिथि)



मैेरे प्रथम जन्मदिवस पर 07 माह की नन्हीं परी, नींद में ही शुभकामनाएं देती हुई। 

नोट बंदी में... बंद हालात, आम मजबूर लाइन में मजदूर

किसी को कैसे विश्वास दिलाए, कि हम कितनी मजबूरियों से गुजर रहें है। घर में जमा पूंजी को एक-एक कर कम होते देख बहुत सी जरूरत की वस्तुओं से दूरी बना रहे है। मैरा यह मानना है कि मध्मवर्गीय परिवारों और इससे नीचे का जीवन जीने वालो  के लिए शायद यह निर्णय अभिशाप की तरह होगा, ऐसे में वह व्यापारी जो एक दिन यह काम पड़ने पर अतिरिक्त लोगों को रोजगार देकर लाखों मदूरवर्गीय परिवारों का जो आसरा थे उन्होंने भी इस नोटबंदी के दौर में बहुत से लोगों से अपना पल्ला रुपयों की किल्लत के चलते छुड़ा लिया है। वह मजदूर वर्ग जो रोज काम की तलाश में घर से निकलता है, आज महीने भर काम न मिलने के कारण घर में बिना सब्जी के सूखी रोटी चाब रहा है। परिवार में बुजुर्गों और बच्चों को विश्वास दिला रहा है कि अब अच्छे दिन आएंगे। जैसे-जैसे एटीएम या बैंक से रुपये  निकालने वालों की लाइन दिन-प्रतिदिन लम्बी हुई है ठीक उसी प्रकार गरीबी रेखा से नीचे आने वाले गरीबों को राशन बांटने वाली दुकान पर लाइनों में लोगों की संख्या में तीन गुना इजाफा हुआ है।
कुछ मध्यमवर्गीय ऐसे लोग भी है जो स्थिति को सुधरने की बांट देख रहे है। जो सजग नागरिक और नेताओं पर विश्वास रखने वाले बहुत से बढ़े-लिखे लोग भयभीत नहीं भी होना चाहते है। सवा महिनों तक घर में रखे राशन पर विश्वास करते हुए और बैंके में जमा पूंजी पर विश्वास के चलते किसी प्रकार गांड़ी तो चला पा रहे है, लेकिन रफतार से कतरा रहे है।  
विश्व में जनसंख्या की दृष्टि से दूसरे नम्बर के देश और एक सौ तीस करोड़ जनसंख्या वाले देश के लिए देश के प्रधानमंत्री का यह निर्णय आम लोगों की जरूरतों से बड़ा नहीं हो सकता। यदि किसी देश का नागरिक परेशानी में रहेगा तो ऐसे में देश की कमान को अपने हाथ में लेने वाले की चिंताा, प्राथमिकता राष्ट्र की जनता होेनी चाहिए। बहुत सी ऐसी परेशानियां है, जो दिखाई नहीं देती, कुछ ऐसी दिक्कते है जो खुद पनप जाती है। ऐसी स्थिति क्यों आती है, इस पर देश के पास मुक्कमल जवाब या व्यवस्था होनी चाहिए।
कुछ लोगों का मानना हो कि यह सब कालाधन को कम करने या कालाधन को पकड़ने के लिए किया जा रहा है, तो ऐसे में क्या हमारे पास एक मात्र यही विकल्प बचा था। यदि हम आय की जांच करना चाहते है तो इसके लिए भी नीति स्पष्ट होनी चाहिए। एक ओर सरकार कालाधन को खत्म करना चाहिए या यू कहे की काला धन रखने वाले कुबेरों को पकड़ना चाहती है तो ऐसे में कुछ के चारों ओर सरकार क्यों घूम रही है, बहुत सी सूचियां सरकार की जानकारी में हैं, उन पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा ? जो बड़ी कम्पनियां है जो गबन करती है उनसे भरपाइ क्यों नहीं की जाती ? यदि कोई घोटाला होता है तो ऐसे में उस रकम की छतिपूर्ति  उसी व्यक्ति से क्यों नहीं की जाती ? बहुत सारे नेता ऐसे है जिनकी सम्मपत्ति कुछ ही सालों में कई सौ गुना हो गई उस से जवाब क्यों नहीं मांगा जाता ? 70 प्रतिशत जनसंख्या आज भी ऐसी है जो अपना जीवन बसर कर रही है। रॉयल जीवन जीने की आशा तो ना ही की जाएं तो अच्छा है। भारत का जीवन स्तर पर कोई बात नहीं होती, लोगों को रोजगार देने की कोई बात नहीं होती, मानव संसाधन मंत्रालय कितनी सुस्ती से काम करता है सब हमारे सामने है यदि व्यवस्था बूढ़ी हो गई है तो ऐेसे में इसे नौजवानों के हाथों में सौप देना चाहिए।  
एक मत यह भी निकल कर आ रहा है कि सरकार राष्ट्र को डिजिटल बनाना चाहती है। कौन ऐसा व्यक्ति नहीं है जो हर काम को सुगमता से न करना चाहता हो, यदि कोई भी व्यवस्था उसके काम को आसान बनाती है तो जनता उसको अपनाने से नही ंचूकते। लेकिन दिक्कत यह है कि देश के बहुत से शहरों में लाइट की स्थिति अभी ठीक नहीं है। इस नोट बंदी के दौर शहरों की बड़ी-बड़ी दुकानों पर भी कार्ड से पेमेंट नहीं हो पा रहा है। हमारी नीति किसी भी व्यवस्था को लाने से पहले हम पूर्ण तैयारी के साथ काम करना चाहिए। जो सरकार की बड़ी चूक रही।
कालधन आया, क्या नहीं आया सरकार जाने, लेकिन आया तो उसका फायदा आम जनता को क्या होगा, नहीं आया तो जनता को इतने दिन क्याे परेशान किया। सवाल अनेक है जो शायद हमे सरकार से नहीं ....सरकार को खुद से पूछने चाहिे। आम जनता को अधिकार के नाम पर क्या मिला है। सब कुछ शायद कुछ नहीं। विचार का प्रश्न है विचार कीजिगा..........

अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष - 2023

भारत गावों का, किसान का देश है। भारत जब आज़ाद हुआ तो वह खण्ड-2 था, बहुत सी रियासतें, रजवाड़े देश के अलग-अलग भू-खण्डों पर अपना वर्चस्व जमाएं ...